‘ये मेरा आज का 28वां ऑर्डर है। लिफ्ट से कस्टमर को ऑर्डर देने जा रहा हूं। देखो भाई, यहां के 15 रुपए मिले। मेरे 15 घंटे होने वाले है और अब तक 762 रुपए की कमाई हुई है। ब्लिंकिट बहुत कम पैसे दे रहा है। मैं घर जा रहा हूं, अब काम नहीं करना है।’ ब्लिंकिट के डिलीवरी पार्टनर हिमांशु थपलियाल ने 29 सितंबर को ये वीडियो बनाया और इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर दिया। वीडियो वायरल हो गया और आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने हिमांशु का जिक्र संसद में किया। हिमांशु ने ब्लिंकिट का काम छोड़ दिया, लेकिन उनके जैसे गिग वर्कर्स की परेशानियां अब भी बची हुई हैं। कम कमाई और 10 मिनट में डिलीवरी के प्रेशर से परेशान गिग वर्कर्स आज यानी 31 दिसंबर को हड़ताल पर हैं। यानी अगर आप न्यू ईयर की पार्टी के लिए कुछ ऑर्डर करें, तो हो सकता है कि वो आपको 10 मिनट में न मिले। इससे पहले गिग वर्कर्स 25 दिसंबर को क्रिसमस पर हड़ताल पर चले गए थे। दैनिक भास्कर ने गिग वर्कर्स की परेशानियों और हड़ताल पर कुछ डिलीवरी पार्टनर से बात की। सबसे पहले हिमांशु की बात
हिमांशु उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले हैं, लेकिन बचपन से परिवार के साथ दिल्ली में रह रहे हैं। किदवई नगर के एक कमरे के मकान में हिमांशु मम्मी-पापा के साथ रहते हैं। इंस्टाग्राम पर उनके वीडियो को 75 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं। 19 साल के हिमांशु बताते हैं, ‘मैंने ब्लिंकिट में 5-6 महीने काम किया। मेरा वीडियो बनाने के पीछे मकसद था कि लोगों को सच्चाई पता चले कि कंपनी कैसे लोगों को पागल बनाती है।’ ‘5 किमी तक के ऑर्डर के लिए ब्लिंकिट से पहले 80 रुपए तक मिलते थे, फिर इसे घटाकर 50 रुपए कर दिया। मैं डिलीवरी के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल किराए पर लेता था। इसके लिए 200 से 250 रुपए रोज देना होता है। इसी से आप कमाई का अंदाजा लगा लीजिए।’ हिमांशु आगे कहते हैं, ‘मुझे नहीं पता था कि मेरा वीडियो वायरल हो जाएगा। मैं बस चाह रहा था कि लोगों तक ये वीडियो पहुंचे। कंपनी कहती है कि एक हफ्ते में आपकी इतनी या उतनी कमाई हो जाएगी, लेकिन ये नहीं बताती है कि आपको कितने घंटे काम करना होगा। कितने समय तक लॉग-इन रहना पड़ेगा। अगर आप लॉग-इन नहीं रहेंगे, तो इंसेंटिव नहीं मिलेगा।’ हिमांशु के पिता अरविंद थपलियाल भी पहले गिग वर्कर थे। तीन साल पहले तक वे फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म स्विगी के लिए काम करते थे। अरविंद कहते हैं, ‘कभी-कभी ऐसा भी होता था कि पूरे दिन काम करने के बाद 200-250 रुपए की कमाई होती थी। इस काम से कोई फायदा नहीं होता।’ ‘2 किमी की डिलीवरी पर 20 रुपए, कंपनी से कोई सुविधा नहीं’
हमने फूड डिलीवरी और क्विक सर्विस का काम कर रहे कुछ और वर्कर्स से मुलाकात की। वे पहचान जाहिर नहीं करना चाहते, इसलिए उनके नाम बदल दिए हैं। 56 साल के सुरेंद्र ढाई साल से जोमैटो के लिए काम कर रहे हैं। हम उनसे दिल्ली के लक्ष्मीनगर में मिले। सुरेंद्र कहते हैं, ‘चाहे ट्रैफिक जाम हो या लोकेशन की दिक्कत हो, लेकिन डिलीवरी लेट होने पर आपकी रेटिंग कम कर दी जाती है। कभी-कभी तो आईडी भी बंद कर देते हैं। 2 किलोमीटर तक की डिलीवरी के लिए मिनिमम 20 रुपए मिलते हैं। इसके अलावा दूरी और समय के हिसाब से हर किलोमीटर के पैसे मिलते हैं। इसके अलावा कोई सुविधा नहीं मिलती।’ सुरेंद्र बताते हैं कि हम लोगों को सिर्फ एक लाख तक दुर्घटना बीमा मिलता है। पिछले साल मेरा एक्सीडेंट हो गया था। कंपनी ने एक लाख रुपए का खर्च उठाया। बाकी के 75 हजार रुपए मुझे खुद देने पड़े। इसके लिए कर्ज लिया था। आज तक ब्याज चुका रहा हूं।’ क्या होना चाहिए: सुरेंद्र कहते हैं कि डिलीवरी के लिए रेट फिक्स होना चाहिए। इंश्योरेंस दिया जाए। अगर रिटायर हो रहे हों, तो पेंशन देना चाहिए। ‘महिलाओं के लिए अलग दिक्कतें, वॉशरूम तक नहीं मिलता’
शाहदरा की रहने वाली नेहा (बदला हुआ नाम) डेढ़ साल से स्विगी में काम कर रही हैं। नेहा बताती हैं, ‘एक ऑर्डर पर सिर्फ 15 रुपए मिल रहे हैं। 15-16 घंटे काम करने के बाद 700-800 रुपए तक कमाई होती है। एक्सीडेंट हो गया तो कोई पूछने वाला नहीं होता। एक बार डिलीवरी के दौरान एक्सीडेंट हो गया, तो कंपनी की तरफ से कहा गया था कि आप ही गाड़ी तेज चला रहे होगे।’ इस पेशे में महिलाओं को ज्यादा दिक्कतें होती हैं। वॉशरूम नहीं होते, पीरियड्स में ज्यादा देर बाहर रहने पर दिक्कत होती है, इसलिए छुट्टी लेनी पड़ती है। कस्टमर से होने वाली समस्याओं पर नेहा कहती हैं, ‘कस्टमर अगर बिल्डिंग में ऊपर के फ्लोर पर रह रहे हैं, तो सामान लेने नीचे नहीं आते। आटे का पैकेट हो या कुछ और सामान, हमें ही ऊपर बुलाते हैं। हम नहीं जाते हैं तो कंपनी से शिकायत कर देते हैं। फिर दो-दो दिन तक हमारी आईडी बंद रहती है। कस्टमर कुछ भी लिखकर डाल देते हैं और हमारी रेटिंग डाउन कर दी जाती है।’ क्या होना चाहिए: नेहा कहती हैं, ‘हम जैसे वर्कर्स को सैलरी के आधार पर रखना चाहिए। कंपनियां मेहनत बहुत करवा रही हैं, लेकिन उस हिसाब से पैसे नहीं दे रहीं। छुट्टी लेने का मतलब है उस दिन की कमाई बंद। सरकार को इसके लिए कोई नियम लाना चाहिए।’ ‘10 मिनट में डिलीवरी का सिस्टम खत्म होना चाहिए’
डिलीवरी पार्टनर अमित (बदला हुआ नाम) कहते हैं, ‘मैं सुबह 10 बजे आईडी ऑन करता हूं। रात के 11 बजे तक काम करते हैं। अगर आपको 1 हजार रुपए कमाना है, तो कम से कम 14-15 घंटे काम करना पड़ेगा। शुरुआत में कंपनियां ठीक पैसे देती थीं, आज घर चला पाना भी बहुत बड़ी बात है।' अमित आगे कहते हैं, ‘10 मिनट में डिलीवरी का सिस्टम खत्म करना चाहिए। अगर टाइम से डिलीवरी नहीं हुई, तो रेटिंग कम कर दी जाती है। फिर हमें ऑर्डर कम दिए जाते हैं। सड़क पर गिर गए या गाड़ी खराब हो गई, तब भी कंपनी को कोई मतलब नहीं है। मैं रोज 12-13 घंटे काम करता हूं, तब 1 हजार रुपए का काम होता है। इसमें भी 200 रुपए पेट्रोल पर खर्च हो जाते हैं।’ डिलीवरी बॉय वर्कर नहीं, पार्टनर, इसलिए सैलरी की जगह इंसेंटिव
गिग इकोनॉमी में कंपनियां संस्थान-कर्मचारी वाले मॉडल को छोड़कर टास्क के आधार पर काम देती हैं। कंपनियां उन्हें वर्कर न मानकर पार्टनर बनाती हैं। अगर कोई पार्टनर उनके तय किए गए नियमों से काम करता है, तो उसे इंसेंटिव दिया जाता है। अगर शिकायत आती है तो उनकी आईडी ब्लॉक कर दी जाती है। नीति आयोग ने 2022 में एक रिपोर्ट में बताया था कि भारत में करीब 77 लाख गिग वर्कर्स हैं। इनमें एप बेस्ड कैब ड्राइवर से लेकर डिलीवरी एजेंट तक शामिल हैं। आयोग का अनुमान है कि 2030 तक इन वर्कर्स की संख्या 2.5 करोड़ तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट में दावा: 25% ड्राइवर 14-16 घंटे काम कर रहे
यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया ने 2024 में पीपुल्स एसोसिएशन इन ग्रासरूट्स एक्शन एंड मूवमेंट और इंडियन फेडरेशन ऑफ एप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स के साथ मिलकर भारत में गिग वर्कर्स पर रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट का नाम था- 'Prisoners on Wheels' यानी पहियों पर कैदी। इसमें 8 शहरों में 10 हजार से ज्यादा वर्कर्स (5302 कैब ड्राइवर और 5082 डिलीवरी एजेंट) से बात कर उनके हालात समझने की कोशिश की गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, 31% एप बेस्ड कैब ड्राइवर 14 घंटे से ज्यादा काम कर रहे हैं। 60% ड्राइवर दिन में 12 घंटे और 83% ड्राइवर 10 घंटे से ज्यादा काम कर रहे हैं। 25% ड्राइवर 14-16 घंटे तक काम करते हैं। सर्वे में शामिल 40.7% ड्राइवर ने बताया कि वे हफ्ते में एक भी छुट्टी नहीं लेते। 43% ने बताया कि रोज के खर्चों (पेट्रोल-डीजल, खाना) के बाद 500 रुपए तक ही कमा पाते हैं। 27% ड्राइवर 500 से 1000 रुपए के बीच कमाते हैं। सर्वे से एक और दिलचस्प जानकारी निकली कि करीब 62% दलित और 60% आदिवासी ड्राइवर दिन में 14 घंटे से ज्यादा काम करते हैं। इनके मुकाबले जनरल कैटेगरी के 16% और OBC कैटेगरी के 26% ड्राइवर ही इतनी देर काम करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इससे जाहिर होता है कि दलित और आदिवासी कम्युनिटी से आने वाले लोगों पर जिम्मेदारियां या कर्ज ज्यादा है। इसलिए उन्हें ओवरवर्क करना पड़ रहा है। सर्वे में करीब 37% ड्राइवर ने बताया कि वे रोज 150 से 200 किलोमीटर ड्राइव करते हैं। 72% ड्राइवर ने बताया कि महीने की कमाई से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होता है। करीब 67% ड्राइवर ने कहा कि वे परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। 86.5% ड्राइवर पीठ, घुटने, पैर या सिर दर्द की समस्या से जूझ रहे हैं। एक्सपर्ट बोले- कर्मचारी का दर्जा देने पर ही फायदा होगा
गिग वर्कर्स एसोसिएशन से जुड़े नीतेश दास कहते हैं कि सरकार और इस तरह की कंपनियों को वर्कर्स के लिए बेहतर माहौल बनाना चाहिए। डिलीवरी पार्टनर को कर्मचारी का दर्जा दिया जाए। नवंबर में लागू वेज कोड में गिग वर्कर्स का जिक्र जरूर है, लेकिन ये लोग किसी संस्थान के कर्मचारी नहीं हैं। आप इन्हें वर्कर्स नहीं मानेंगे, तब तक कोई फायदा नहीं है क्योंकि सारे कानून संगठित मजदूरों के लिए लागू होते हैं।’ गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन के राष्ट्रीय संयोजक निर्मल गोराना अग्नि कहते हैं कि इंसेंटिव के नाम पर ये कंपनियां वर्कर्स से जबरिया मजदूरी करवा रही हैं। कंपनियों को रेटिंग का धंधा बंद करना चाहिए क्योंकि ये पारदर्शी नहीं है। राजस्थान और कर्नाटक में गिग वर्कर्स को लेकर कानून बने हैं। हालांकि ये कानून सिर्फ उनकी सामाजिक सुरक्षा से जुड़े हैं। इन कानूनों में भी उनकी मांगों का समाधान नहीं हो पाया है। केंद्र सरकार ने भी उनके मिनिमम वेज, काम के घंटे और दूसरी मांगों पर अब तक पहल नहीं की है। हमने गिग वर्कर्स के मुद्दों पर केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया से संपर्क करने की कोशिश की। जवाब नहीं मिलने पर श्रम मंत्रालय को गिग वर्कर्स के मुद्दों और सरकार की तरफ से हो रही कोशिशों पर कुछ सवाल भेजे हैं। ब्लिंकिट और जोमैटो को भी मेल भेजा है। उनकी तरफ से रिप्लाई नहीं आया है। जवाब आने पर रिपोर्ट अपडेट की जाएगी। ...................................
ये रिपोर्ट भी पढ़ें दिल्ली दंगे के 5 आरोपी बरी, कोर्ट ने कहा- पुलिस के पास सबूत नहीं दिल्ली के चांद बाग में रहने वाले मोहम्मद खालिद को पुलिस ने फरवरी 2020 में अरेस्ट किया था। उन्हें दिल्ली दंगों के दौरान भजनपुरा में पेट्रोल पंप जलाने के मामले में आरोपी बनाया गया। फिर एक के बाद एक 19 केस में उनका नाम शामिल हो गया। 11 दिसंबर को दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट ने खालिद समेत 5 आरोपियों को इस केस में बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं दे पाई। पढ़िए पूरी खबर...