10 हजार जानें बचाने वाले वायनाड के हीरोज:8 घंटे में पहाड़ी चढ़ी, 4 मासूम बचाए; 24 घंटे में 190 फीट लंबा पुल बनाया

1 year ago 8
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तारीख: 2 अगस्त समय: सुबह के 8 बजे ‘वायनाड के चूरलमाला में हुई लैंडस्लाइड का तीसरा दिन। भारी बारिश हो रही थी। पहाड़ पर सालों से जमी काई पर चलना लगभग असंभव सा लग रहा था। एक गलत कदम और हम कई फीट गहरी खाई में समा सकते थे। इसके बावजूद हमने हिम्मत नहीं हारी। हमारी टीम जान जोखिम में डालकर रस्सियों के सहारे एराट्टुकुंडु की उस गुफा तक पहुंचने में कामयाब रही, जहां पिछले 4 दिनों से 4 मासूम बच्चे, अपने माता-पिता के साथ फंसे हुए थे।’ ये जांबाज रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर के. हाशिफ हैं, जिन्होंने 4 लोगों की टीम के साथ सैकड़ों मीटर की ऊंचाई पर फंसे 6 लोगों को रेस्क्यू किया। हाशिफ वायनाड हादसे के अकेले हीरो नहीं है। उनके जैसे हजारों लोग पिछले 6 दिनों से रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटे हैं। 30 जुलाई की रात वायनाड में हुई लैंडस्लाइड ने चार गांवों में तबाही मचाई। मुंडक्कई में बहने वाली चेलियार नदी का पानी मुंडक्कई के अलावा चूरलमाला, अट्टामाला और नूलपुझा में सबकुछ बहा ले गया। 369 लोगों की मौत हो गई और 200 से ज्यादा लोग अभी लापता हैं। घर तबाह होने से 10 हजार से ज्यादा लोग रिलीफ कैंप में रह रहे हैं। वायनाड के प्रभावित इलाकों में चल रहे रेस्क्यू ऑपरेशन में इंडियन आर्मी-नेवी के जवान से लेकर NDRF की टीम, फॉरेस्ट टीम, केरल पुलिस, कोस्ट गार्ड, एनजीओ और फायर एंड रेस्क्यू सर्विस से जुड़े लोग शामिल हैं। दैनिक भास्कर ने वायनाड हादसे के ऐसे ही कुछ हीरोज से मुलाकात की। रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर के. हाशिफ और उनकी 4 लोगों की टीम वायनाड में रेस्क्यू ऑपरेशन का हिस्सा है। उन्होंने टीम के साथ मिलकर एक फैमिली को रेस्क्यू किया। 4 दिन से 4 बच्चे और उनके माता-पिता एराट्टुकुंडू की गुफा में फंसे थे। हाशिफ बताते हैं, ‘फैमिली को रेस्क्यू करने के दौरान हमें 40 मीटर के सीधे पहाड़ पर चढ़ना था। ये हमारे लिए जानलेवा साबित हो सकता था। मुश्किल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जमीन से महज 7 किमी की दूरी तय करने में हमें पूरे 8 घंटे का समय लगा।’ ‘ऊपर चढ़ने से ज्यादा बड़ी चुनौती परिवार को नीचे लाने की थी। हमने घर में मौजूद चादरें फाड़ीं और उसके सहारे चारों बच्चों को अपने सीने पर कसकर बांधा। इसके बाद हम पेड़ की डालियों का सहारा लेते हुए नीचे उतरे और चूरलमाला पहुंच सके।’ हाशिफ कहते हैं, ‘हमारे लिए अपनी जिंदगी से ज्यादा बड़ा हमारा फर्ज है, जिसे हमने ईमानदारी से निभाया।’ हाशिफ के साथ इस ऑपेरशन में मुंडक्कयम डिवीजन के फॉरेस्ट ऑफिसर जयचंद्रन, कलपेट्टा रेंज बीट फॉरेस्ट अफसर के अनिल कुमार और कलपेट्टा रैपिड रिस्पॉन्स टीम के मेंबर अनूप थॉमस भी शामिल थे। वायनाड में हुई लैंडस्लाइड से सबसे ज्यादा तबाही मुंडक्कई, चूरलमाला, अट्टामाला और नूलपुझा गांव में हुई। हादसे के दिन मुंडक्कई और चूरलमाला में मदद के लिए सबसे पहले पास के वेल्लारीमाला गांव के लोग पहुंचे थे। हम इन मददगारों से मिलने वेल्लारीमाला गांव पहुंचे। यहां हमारी मुलाकात चाय की दुकान चलाने वाले सुंदरम से हुई। वे बताते हैं, ‘रात के 2 बजे हमें फोन पर पता चला कि मुंडक्कई और चूरलमाला में लैंडस्लाइड हुआ और लोग फंसे हुए हैं। मैंने पड़ोसियों को जगाना शुरू किया। रस्सी, फावड़े और कुदाल लेकर हम पैदल ही घटना वाली जगह पर पहुंचे।’ सुंदरम बताते हैं, ‘ये वक्त पहली लैंडस्लाइड के ठीक बाद का था। गांव में चारों तरफ पानी भर गया था। हमारे साथ गए गांव के लोग कंधे तक चढ़ चुके पानी में उतरे और लोगों की जान बचाई। हमने सीढ़ियों और रस्सी के सहारे 100 से ज्यादा लोगों को रेस्क्यू किया। यहीं हमारी मुलाकात सुनील थॉमस से हुई। वे भी घटना की रात से लोगों की मदद के लिए घटनास्थल पर थे। सुनील बताते हैं, ‘कई लोगों को तो हम अपने कंधों पर उठाकर लाए। घटना के बाद भी पिछले 6 दिन से हमारे गांव के युवक वहां जाकर राहत और बचाव कार्य में जुटे हैं। वायनाड में सिर्फ केरल के ही नहीं, आसपास के राज्य कर्नाटक और तमिलनाडु से भी हजारों लोग बचाव कार्य के लिए पहुंचे। इन्हीं में से एक कर्नाटक के मैसूर के रहने वाले मोहम्मद मुसीब हैं। सुबह 7 बजे मुसीब को पता चला कि वायनाड में लैंडस्लाइड की घटना हुई। उन्होंने अपने 4 दोस्तों को साथ चलने के लिए तैयार किया। फिर एक एम्बुलेंस किराए पर ली। वे बिना किसी बुलावे के 380 किमी दूर वायनाड के लिए निकल गए। पिछले 6 दिनों से वे लगातार घायलों और डेड बॉडीज को अपनी एम्बुलेंस से अस्पताल पहुंचाने का काम कर रहे हैं। वे कहते हैं, ‘हमें किसी ने नहीं बुलाया। हम यहां सिर्फ इंसानियत के नाते आए हैं। रेस्क्यू के दौरान हमने छोटे-छोटे लोगों के कटे हुए हाथ-पैर, बच्चों की किताब-कॉपियां और बैग देखे। ये सब दिल दहला देने वाला था। इसके बावजूद हमने हिम्मत नहीं हारी। यहां तक पहुंचना इतना मुश्किल है कि कई बार हमें सिर्फ दिन में एक बार ही खाना मिल पाता।’ लैंडस्लाइड के दौरान चूरलमाला में 100 साल पुराना बेली ब्रिज टूट गया। इसे अंग्रेजों ने अपने टी स्टेट तक जाने के लिए बनवाया था। इसके टूटने से सबसे ज्यादा प्रभावित मुंडक्कई हुआ। वायनाड से उसका कनेक्शन टूट गया। घटना के अगले दिन यहां इंडियन आर्मी पहुंची। सेना के जवानों ने इस ब्रिज को बनाने का काम शुरू किया। सेना की कमान संभाल रहे ब्रिगेडियर अर्जुन उप्पल बताते हैं, ‘आज मौसम खुल गया, लेकिन जब हम यहां आए थे तब भीषण बारिश हो रही थी। ऐसे में 190 फीट लंबा और 24 टन का ब्रिज बनाना चुनौतियों से भरा था। पानी का बहाव बहुत तेज था और कीचड़ में चलते हुए बड़े-बड़े लोहे के गार्डर को कंधे पर उठाना भी मुश्किल था।’ ब्रिगेडियर अर्जुन आगे बताते हैं, ‘हम बाहर से आए थे, इसलिए यहां के मौसम में ढलने में थोड़ा वक्त लगा। खराब मौसम के बावजूद हमारी 400 लोगों की टीम लगातार हेलिकॉप्टर और पैदल लोगों का रेस्क्यू कर रही है।’ कवरेज के दौरान हमारे सामने ही पहाड़ पर फंसे तीन लोगों को रेस्क्यू कर चूरलमाला लाया गया। अर्जुन बताते हैं, ‘घटना के दूसरे दिन हमने लकड़ी का एक अस्थाई ब्रिज भी बनाया। हमारे जवान रस्सियां पकड़कर घंटों पानी में खड़े रहे। जवान लगातार मलबे से शव निकाल रहे हैं। हम जल्द ही ऑपरेशन को पूरा कर लेंगे। हमारे दो हेलिकॉप्टर रेस्क्यू के काम में जुटे हुए हैं। आर्मी की टीए बटालियन के 130 जवान भी रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटे हुए हैं। कभी इसी सेना का हिस्सा रहे मलयालम फिल्मों के सुपरस्टार मोहनलाल भी शनिवार को मुंडक्कई पहुंचे। उन्होंने रेस्क्यू में मदद की। साथ ही CM रिलीफ फंड में 25 लाख रुपए देने का भी ऐलान किया। ब्रिज के पास ही हमें इंडियन नेवी के कुछ जवान मिले। वे तकरीबन 20 फीट कीचड़ में धंसे घरों का मलबा हटा रहे थे। इनमें इंडियन नेवल अकादमी से आए लेफ्टिनेंट किरण बताते हैं, ‘हमारे लिए ये ऑपरेशन बहुत चैलेंजिंग था। जिला प्रशासन से मिली जानकारी के बाद हम 90 लोगों की टीम लेकर यहां पहुंचे। ब्रिज बह चुका था। तेज बहाव के बीच हम चेलियार नदी पैदल पार कर उस पार पहुंचे।’ ‘वहां तक ब्रिज के बिना मशीनों का पहुंच पाना नामुमकिन था, इसलिए हम हाथों से खुदाई कर रहे थे। इस दौरान टीम के लोगों को नदी में बह रहे शवों के कुछ हिस्से भी मिले।’ किरण बताते हैं, ‘हमारे 3 अफसरों और 30 नौसैनिकों की एक टीम ने बेली ब्रिज के कंस्ट्रक्शन में भारतीय सेना की मदद की। हमने 2 अगस्त को कालीकट से हेलिकॉप्टर (एएलएच) के जरिए प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वे किया। ‘इस दौरान हमने जिंदा बचे लोगों का रेस्क्यू किया। साथ ही कुछ डेड बॉडीज भी रिकवर कीं। राज्य की पुलिस फोर्स को आपदा वाले इलाके में पहुंचाया, जहां सड़क के रास्ते पहुंचना नामुमकिन था।’ वायनाड में घटनास्थल पर फ्रंट वर्कर के तौर पर केरल फायर एंड रेस्क्यू टीम के 645 जवान और अफसर काम कर रहे हैं। वे न सिर्फ शवों को मलबे से निकाल रहे हैं, बल्कि उन्हें हॉस्पिटल तक पहुंचाने का जिम्मा भी इन्हीं पर है। कुन्नर रीजन के हेड और इस ऑपरेशन के इंचार्ज सैम रंजीत बताते हैं, ‘हमें घटना की जानकारी सुबह 3 बजे मिली। इसके बाद हम 300 लोगों की टीम लेकर घटनास्थल के लिए निकले।’ ‘यहां पहुंचने पर पता चला कि मुंडक्कई को जोड़ने वाला ब्रिज बह चुका है। इसके बाद हमने सीढ़ियों के सहारे एक अस्थाई ब्रिज बनाया और मुंडक्कई गांव पहुंचे। गांव में रेस्क्यू के लिए पहुंचने वाली हमारी टीम पहली थी। हमने रात के अंधरे में ही रेस्क्यू शुरू कर दिया। 400 लोगों को सही-सलामत बाहर निकाला। इनमें से कई बुजुर्गों को गोद में उठाकर निकालना पड़ा।’ अब बात वायनाड त्रासदी के उन हीरोज की, जिन्हें न सिर्फ मौके पर पहुंचकर लोगों को बचाना था, बल्कि रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए एक सुरक्षित माहौल भी बनाना था। केरल पुलिस के 1600 जवान इसके लिए तैनात किए गए। मैपर्डी से मुंडक्कई की दूरी तकरीबन 16 किमी है। इस रास्ते को रेस्क्यू के लिए सिक्योर जोन बनाने का काम वायनाड पुलिस का था। पुलिस के जवान रास्ते पर सुरक्षा व्यवस्था देखने के लिए 12 से 14 घंटे खड़े रहे। ‘घटनास्थल पर पहुंच रही भीड़ को रोकने पर उन्हें लोगों के गुस्से का भी सामना करना पड़ा। हॉस्पिटल में मैनेजमेंट से लेकर शवों का पोस्टमॉर्टम करवाने और उन्हें परिवारों को सौंपने की जिम्मेदारी भी केरल पुलिस संभाल रही। लॉ एंड ऑर्डर की सिचुएशन को मेंटेन करने के अलावा केरल पुलिस ने यहां 20 हजार लीटर पीने का पानी भी पहुंचाया।’ NDRF के DIG मोहसिन शाहेदी ने बताया कि वायनाड में NDRF की चार टीमें राहत और बचाव के काम में लगातार जुटी हैं। इसमें 130 से ज्यादा लोग शामिल हैं। रेस्क्यू का काम आखिरी दौर में है और हमें उम्मीद है कि जल्द ही हम इसे पूरा कर लेंगे।’ हमारी अगली हीरो दो बच्चों की मां है, जो वायनाड हादसे में अपनी मां खो चुके दुधमुंहे बच्चों को अपना दूध पिला रही हैं। लैंडस्लाइड की जानकारी मिलते ही भावना अपने पति के साथ इडुक्की से वायनाड पहुंची। वहां कई रिहेब सेंटर्स में जाकर उन्होंने बच्चों को दूध पिलाया। भावना ने सोशल मीडिया में एक पोस्ट कर बताया, 'मैं दो छोटे बच्चों की मां हूं। मैं जानती हूं कि मां के बिना बच्चों की क्या हालत होगी। ये सब देखते हुए ही मैंने ये फैसला लिया है। मैंने जब अपने पति से इस बारे में चर्चा की, तो उन्होंने भी इसका समर्थन किया। इसलिए हमने मदद करने का फैसला लिया।' वायनाड में सेना और पुलिस ही नहीं पॉलिटिकल पार्टीज के सदस्य भी हर तरह की मदद देने में जुटे हैं। BJP, कांग्रेस, मुस्लिम लीग, SFI और अन्य कई दलों के लोग वॉलंटियर के तौर पर घटनास्थल पहुंचे। सभी मिलकर रेस्क्यू ऑपरेशन में जुट गए। कुछ कार्यकर्ताओं ने हॉस्पिटल में जिम्मेदारी संभाली, कुछ ग्राउंड जीरो पर रेस्क्यू में लगे रहे। वहीं, कुछ कार्यकर्ताओं ने बचे हुए लोगों और बचाव दल के लिए खाने का इंतजाम संभाला। BJP युवा मोर्चा के स्टेट प्रेसिडेंट प्रफुल्ल कृष्णन पिछले 6 दिन से मुंडक्कई में 40 लोगों की टीम के साथ रेस्क्यू में जुटे हैं। वे बताते हैं, ‘यहां स्वयंसेवकों ने अब तक 9300 से ज्यादा लोगों को रिलीफ कैंप में पहुंचाया है। हमने राजनीति को किनारे कर सभी दलों के साथ रेस्क्यू की जिम्मेदारी बांटी है।’ ‘हमने केरल भर में राहत सामग्री का इंतजाम किया। यहां के सोशल एक्टिविस्ट फिरोज ए अजीज ने एक कलेक्शन सेंटर बनाया है। माउंटेन एंड एडवेंचर स्पोर्ट्स अकादमी के लोग भी राहत कार्य में जुटे हुए हैं।’ प्रफुल्ल आगे बताते हैं, ‘एक वक्त तो यहां मदद करने वालों की भीड़ इतनी ज्यादा हो गई कि हमें 100 से ज्यादा एम्बुलेंस और हजारों लोगों को वापस भेजना पड़ा। सांसद शशि थरूर ने अपने ऑफिस में एक राहत संग्रह केंद्र स्थापित किया है। शहर के लगभग सभी स्कूलों को रिहैब सेंटर बना दिया गया है। फ्री में 24 घंटे लोगों को पानी और फूड सप्लाई हो रही है।’ इस रेस्क्यू ऑपरेशन में 10 डॉग्स भी लगाए गए हैं। हम जब घटनास्थल पर पहुंचे तो तीन डॉग्स माया, मर्फी और मैगी सर्च ऑपरेशन में लगे थे। इनमें तमिलनाडु से आए माया और मर्फी ह्यूमन रीमेन डिटेक्शन (HRD) डॉग्स हैं। इन्हें डेडबॉडीज की तलाश करने के लिए ट्रेंड किया गया है। वहीं, मैगी ऐसी हादसों के वक्त मलबे में फंसे लोगों की खोजबीन में माहिर है। इनके इंस्ट्रक्टर प्रभात पीवी ने बताया कि जब हम 30 जुलाई को यहां पहुंचे और अगले दिन अपना अभियान शुरू किया, तब डॉग्स ने दो शव ढूंढे। 1 अगस्त को हमें 15 डेडबॉडीज मिलीं, जबकि 2 अगस्त को हमें छह डेडबॉडी मिलीं।
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