'24 साल टीचर रहीं, BLO बनाकर मां को मार डाला':कामचोर कहा तो फांसी लगाई, पश्चिम बंगाल SIR में 39 मौतों की वजह क्या

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‘मां के मरने के बाद लोगों ने तरह-तरह की बातें कहीं। बहुत बुरा लगा, जब उन्हें फाकीबाज (कामचोर) कहा गया। वे स्कूल में बायोलॉजी पढ़ाती थीं। उम्र 53 साल थी। कुछ साल में रिटायर हो जातीं। दो महीने पहले ही उन्हें बीएलओ बनाया गया था। 24 साल की नौकरी में पहली बार ये काम कर रही थीं। SIR के काम की वजह से प्रेशर में थीं। 22 नवंबर की रात उन्होंने सुसाइड कर लिया।’ पश्चिम बंगाल में नादिया जिले के कृष्णानगर में रहने वाले अरिक्तो रिंकू तरफदार के बेटे हैं। रिंकू टीचर थीं, लेकिन पश्चिम बंगाल में SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविजन की प्रोसेस शुरू होने के बाद उन्हें बीएलओ का काम मिला था। आरोप है कि रिंकू पर काम समय से पूरा करने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। इससे वे परेशान थीं और उन्होंने फांसी लगा ली। सुसाइड नोट में भी उन्होंने काम के दबाव की बात लिखी है। SIR के दूसरे फेज में राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल समेत 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में वोटर लिस्ट के लिए डेटा जुटाया जा रहा है। 30 नवंबर तक 7 राज्यों में 29 बीएलओ की अलग-अलग वजहों से मौत हो चुकी है। सबसे ज्यादा 9 मौतें मध्यप्रदेश में हुई हैं। पश्चिम बंगाल में मार्च-अप्रैल में चुनाव होने हैं। इसलिए यहां SIR की वजह से ज्यादा कंट्रोवर्सी है। सरकार चला रही TMC का दावा है कि SIR के दौरान राज्य में 39 मौतें हो चुकी हैं। इनमें 4 बीएलओ हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने SIR पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है। पश्चिम बंगाल में 4 बीएलओ की मौत, दो सुसाइड ‘मेरी आत्महत्या के लिए इलेक्शन कमीशन जिम्मेदार है। मेरा किसी पार्टी से ताल्लुक नहीं है। मैं बहुत साधारण इंसान हूं, जो इलेक्शन कमीशन के इस दबाव को नहीं झेल पा रही हूं। मैंने ऑफलाइन 95% काम पूरा कर लिया है, लेकिन ऑनलाइन नहीं कर पा रही हूं। इसके लिए BDO ऑफिस और सुपरवाइजर को भी बताया, लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी। ऐसा दबाव बाकी बीएलओ पर न डाला जाए।’ ये रिंकू तरफदार के सुसाइड नोट का एक हिस्सा है, जिसमें उन्होंने इलेक्शन कमीशन और वर्कलोड का जिक्र किया था। हमने इस बारे में रिंकू के बेटे अरिक्तो से बात की। रिंकू के भाई कैफे चलाते हैं, अरिक्तो से हमारी मुलाकात उनके कैफे में ही हुई। अरिक्तो बताते हैं, ‘मां दो महीने पहले ही बीएलओ बनी थीं। ये काम पढ़ने-पढ़ाने से एकदम अलग था। वे लगातार परेशान थीं। इलेक्शन कमीशन की ओर से कोई भी नया नोटिफिकेशन आता, तो घबरा जाती थीं।’ ‘मम्मी ने इतने साल एक सेट पैटर्न में बच्चों को पढ़ाया था। इस उम्र में आकर कुछ नया सीखना थोड़ा मुश्किल था। उन्होंने फील्ड का सारा काम लगभग कर लिया था। उन्हें बस डेटा अपलोड करने में परेशानी हो रही थी।' अरिक्तो आगे बताते हैं, 'मैं और मेरी दीदी दोनों घर पर नहीं रहते। कोरोना के दौरान मम्मी को ऑनलाइन क्लास लेनी होती थी। तब मैं या दीदी जूम में क्लास शुरू कर देते थे। इस बार काम थोड़ा मुश्किल था। इलेक्शन कमीशन की तरफ से बार-बार चीजें बदली जा रही थीं।’ ‘मम्मी को डर था, कुछ गलती न हो जाए’ अरिक्तो मम्मी के साथ वॉट्सऐप पर 18 नवंबर को हुई चैट दिखाकर बताते हैं, ‘सुसाइड से 4 दिन पहले मम्मी ने मेरे पास इलेक्शन कमीशन का नोटिफिकेशन भेजा था। पूछा था कि इसमें क्या करना है। वे बहुत घबराई हुई थीं। उन्हें डर था ऑनलाइन कुछ गलत हो गया, तो क्या होगा। पहले करेक्शन का भी ऑप्शन नहीं था, न ही कोई हेल्पलाइन नंबर था।’ अरिक्तो बताते हैं, ‘मम्मी की ड्यूटी 18 किलोमीटर दूर थी। उनका स्कूल भी वहीं था। हम 2013 में चापरा से कृष्णानगर शिफ्ट हो गए थे। सारे डॉक्यूमेंट पुराने घर के ही थे, इसलिए मम्मी को बीएलओ का काम भी वहीं के हिसाब से मिला था।’ ‘मम्मी को रोज 18 किमी दूर जाना पड़ता था। ऑनलाइन अपलोड से बढ़ते प्रेशर को देखते हुए उन्होंने बीडीओ को इसकी शिकायत की, ताकि उन्हें काम से हटा दिया जाए। बीडीओ नहीं माने और नौकरी छोड़ने के लिए कहने लगे। मम्मी ने तुरंत नौकरी छोड़ने के लिए हां कर दी थी, लेकिन उन्हें कहा गया तो काम करके देना पड़ेगा।’ ‘नौकरी छोड़ने के बारे में कहा, लेकिन छोड़ नहीं पाईं’ आगे की बात अरिक्तो के पास बैठे उनके मामा अर्नब साह बताते हैं। वे कहते हैं, ‘दीदी इस काम को लेकर परेशान थी। उन्होंने पहले स्कूल के प्रिंसिपल को बताया था। उन्होंने बीडीओ से मिलने के लिए कहा। बीडीओ ऑफिस से कलेक्टर ऑफिस जाने के लिए कहा गया। वहां उनसे कहा गया कि नौकरी छोड़ दो। दीदी घर आईं और हमसे पूछा कि मैं नौकरी छोड़ दूं क्या। तीन दिन कहती हैं कि मुझे पता चला है, अगर मैं नौकरी छोड़ भी दूं, तो भी काम पूरा करना ही पड़ेगा। अर्नब आगे कहते हैं, ‘दीदी को नौकरी का लालच नहीं था। उनका परिवार संपन्न है। जीजाजी का बिजनेस हैं। दीदी को सिर्फ 14,500 रुपए सैलरी मिलती थी। पढ़ाना उनका पैशन था। हर किसी को सिर्फ सुसाइड के बारे में जानना है, लेकिन इसके बाद क्या कुछ सुधार होगा। इतनी बड़ी प्रक्रिया के तहत काम किया जा रहा है, लेकिन न कोई हेल्प लाइन नंबर है, न ही कोई हेल्प डेस्क, क्या और बीएलओ की मौत का इंतजार हो रहा है।’ शांतिमणि एक्का आंगनबाड़ी में काम करती थीं। बीएलओ बनाए जाने के बाद वे घर-घर जाकर SIR के फॉर्म बांटती थीं। फिर उन्हें वापस लेने जाती थीं। 19 नवंबर को उन्होंने अपने घर के आंगन में फांसी लगा ली। शांतिमणि की बेटी सुलेखा बताती हैं, ‘मेरी मम्मी के लिए ये काम कर पाना बहुत मुश्किल था। उन पर जल्दी काम करके देने का दबाव था। वे इस प्रेशर को बर्दाश्त नहीं कर पाईं। हमारा घर चाय बागान वाले एरिया में है।’ सुलेखा आगे बताती हैं, ‘ज्यादातर लोग फॉर्म नहीं भर पा रहे थे। सभी मम्मी से ही फॉर्म भरवा रहे हैं। कुछ लोग खुद फॉर्म भर कर दे रहे थे, उसमें कई गलतियां कर रहे थे। लोग बार-बार मम्मी से कह रहे थे अगर कुछ गलत हो गया, तो हमें सरकारी सुविधा नहीं मिल पाएगी। ‘सारा दिन फील्ड में काम करने के बाद घर पर फॉर्म भरती थीं। उस पर भी अधिकारी रोज रात को कहते थे कि जल्दी काम करो, अभी इतना ही काम हुआ है। यह प्रेशर लगातार बढ़ रहा था। मम्मी भाषा और ऑनलाइन फॉर्म भरने को लेकर परेशान थी।' 'वे आंगनबाड़ी वर्कर थीं, उनसे ऑनलाइन काम की उम्मीद नहीं की जा सकती। परेशान होकर मम्मी और भाई जॉइंट बीडीओ मोहम्मद तौकीफ अली के पास गए थे। उनसे कहा था कि ये काम नहीं हो पाएगा। उन्होंने कोई बात नहीं सुनी।' हमने इस बारे में जॉइंट बीडीओ से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। कहा कि इस बारे में सीनियर अधिकारियों से पूछिए। माल बाजार एसडीओ ने भी बयान देने से इनकार कर दिया। बीएलओ बोले- ऑनलाइन फॉर्म भरने की ट्रेनिंग नहीं मिली हमने कुछ बीएलओ से SIR की प्रोसेस के दौरान होने आ रही परेशानियों के बारे में बात की। सबोरनी सन्याल मंडल कृष्णानगर की बीएलओ हैं। उनका ऑनलाइन फॉर्म भरने का कुछ काम बाकी रह गया है। सबोरनी बताती हैं, ‘14 नवंबर से SIR का काम शुरू हुआ। उसी दिन से ऑनलाइन फॉर्म भी अपलोड करने थे। इसके लिए कई बार नियम बदले गए। सबसे बड़ी समस्या थी कि फॉर्म में गलती सुधारने का विकल्प नहीं था। इससे बीएलओ परेशान थे कि सरकारी कागज हैं, कोई गलती न हो जाए। शिकायत के बाद इसे ठीक किया गया। 22 नवंबर के बाद सारी चीजें दुरुस्त हुईं। तब से काम सही चल रहा है।’ काम में क्या दिक्कतें आईं? सबोरनी बताती हैं, ‘हमें सिर्फ ऑफलाइन फॉर्म भरने के लिए ट्रेनिंग दी गई है। ऑनलाइन फॉर्म भरने के लिए ट्रेनिंग नहीं मिली। सबसे बड़ी समस्या अपलोडिंग की थी। दिन में तो ज्यादातर वेबसाइट बिजी रहती है। कई बार इतनी हैंग होती कि पूरा फॉर्म भरने के बाद अगर सब्मिट नहीं हुआ, तो दोबारा पूरी प्रोसेस करनी पड़ती है।' 'मैं कई बार फंस गई थी। बाद में मैंने सुबह 4 बजे उठकर फॉर्म भरना शुरू किया। इसके अलावा सीरियल नंबर मिलने में भी देरी हुई। इससे फॉर्म बांटने में परेशानी हुई।’ हालांकि आसनसोल के बीएलओ मोहित कुमार सिंह बताते हैं, ‘हमें एक-एक चीज की ट्रेनिंग दी गई है। कई बार अधिकारी बीएलओ के साथ फील्ड पर गए। एक समस्या भाषा को लेकर हुई, इससे बीएलओ का काम बढ़ गया।’ ‘पूरा फॉर्म बांग्ला में था। हिंदी प्रदेशों से आए लोगों को बांग्ला नहीं आती। फॉर्म अंग्रेजी में भरने का प्रावधान है। मैंने कई वोटर्स को एक-एक चीज अच्छे से बताई, फिर भी गलतियां हुईं। आखिर में मैंने वोटर्स को घर में बुलाकर, सामने बैठाकर फॉर्म भरवाया। इसमें काफी समय लगा, लेकिन गलती की आशंका कम हो गई।’ ‘इसके अलावा ऑनलाइन फॉर्म भरने में परेशानी हुई। कई बार फॉर्म भरने के बाद भी उस पर डेटा अपडेट नहीं होता है। हम लोगों के पास भी 11 दिसंबर तक का समय है। अगर तब तक नहीं दिया, तो ऑनलाइन अपडेट में परेशानी होगी।’ एक परेशानी उर्दू बोलने वाले लोगों को हो रही है। पश्चिम बंगाल के इंडस्ट्रियल इलाके में यूपी-बिहार के ज्यादातर मुस्लिम उर्दू बोलते हैं। इसकी वजह उर्दू स्कूल हैं। फरहद जबी उर्दू भाषा स्कूल में टीचर हैं। उनका घर बर्धमान जिले की कुल्टी विधानसभा सीट में है। फरहद भी बीएलओ हैं। वे कहती हैं, ‘मेरे इलाके में ज्यादातर लोग उर्दू बोलने वाले हैं और फॉर्म बांग्ला में है। मुझे अंग्रेजी का एक ऑनलाइन फॉर्म मिला था। इसके जरिए मैंने वोटर्स को समझा दिया। यह परेशानी मेरे लिए भी थी।’ कुल्टी के नियामतपुर में रहने वाले मोहम्मद तबरेज अंसारी SIR का फॉर्म भरने आए थे। वे कहते हैं, ‘SIR के फॉर्म में भाषा का विकल्प नहीं है। आप फॉर्म तो अंग्रेजी में भर सकते हैं, लेकिन पढ़ना तो बांग्ला में है। इस परेशानी को दूर करने के लिए बांग्ला समझने वाले लड़कों से मदद लेनी पड़ी।’ ममता का वादा- किसी का नाम वोटर लिस्ट से नहीं कटेगा पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी TMC SIR का विरोध कर रही है। कोलकाता के धर्मतल्ला में पार्टी की रैली में ममता ने कहा कि SIR के डर से लोग जान न दें, किसी का भी नाम वोटर लिस्ट से नहीं हटेगा। वहीं मुर्शिदाबाद में हुई रैली में उन्होंने कहा कि SIR के बहाने BJP पश्चिम बंगाल में डिटेंशन कैंप खोलना चाहती है। मैं ऐसा होने नहीं दूंगी। इसके अलावा TMC सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल 28 नवंबर को चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार से मिला था। उन्हें SIR की प्रक्रिया के दौरान मरने वाले 39 लोगों की लिस्ट सौंपी, जिनमें रिंकू तरफदार और शांतिमणि एक्का के अलावा 2 और बीएलओ हैं। BJP बोली- ममता सरकार मदद करती तो बीएलओ पर कम प्रेशर होता बीएलओ के सुसाइड के बारे में पूछने पर BJP की जनरल सेक्रेटरी अग्निमित्रा पॉल ममता सरकार पर आरोप लगाती हैं। वे कहती हैं, ‘इलेक्शन कमीशन ने ऑनलाइन प्रोसेस आसान बनाने के लिए राज्य सरकार से एक हजार डेटा ऑपरेटर मांगे थे, ताकि जिन बीएलओ को ऑनलाइन फॉर्म भरने में परेशानी हो रही है, उन्हें सुविधा मिले। राज्य सरकार ने मदद नहीं की।' SIR के लिए पश्चिम बंगाल में 80,600 से ज्यादा बीएलओ, 8 हजार सुपरवाइजर, 3 हजार AERO और 294 ERO तैनात हैं। नवंबर के आखिरी सप्ताह तक राज्य में करीब 14 लाख फॉर्म ‘अनकलेक्टेबल’ के तौर पर पहचाने गए हैं। ये वोटर या तो गैर-हाजिर थे, डुप्लीकेट थे, मर चुके हैं या हमेशा के लिए कहीं चले गए हैं। SIR का फॉर्म भरने की आखिरी तारीख 4 दिसबंर से बढ़ाकर 11 दिसंबर कर दी गई है। ड्राफ्ट की पहली लिस्ट 16 दिसंबर तक आएगी। सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिसंबर को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि वे SIR में लगे बूथ लेवल अधिकारियों से काम का दबाव कम करने के लिए अतिरिक्त स्टाफ लगाने पर विचार करें। ..................................... SIR पर ये स्टोरी भी पढ़ें बंगाल में SIR के विरोध में BLO का प्रदर्शन SIR के विरोध में एक दिसंबर को कोलकाता में पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) के ऑफिस के बाहर BLO अधिकार रक्षा कमेटी के सदस्यों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की। ठीक उसी समय BJP नेता सुवेंदु अधिकारी और पार्टी के MLA चुनाव अधिकारियों के साथ मीटिंग के लिए पहुंचे थे। BJP कार्यकर्ताओं से भी प्रदर्शनकारियों की बहस हुई। पढ़िए पूरी खबर...
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