तारीख: 13 मई जगह: यूपी के हरदोई जिले का घेरवा गांव
इलेक्शन ड्यूटी पूरी करके होमगार्ड खुशीराम देर रात घर लौटे। उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। लगातार उल्टियां हो रही थीं। 102 डिग्री बुखार था। अगले दिन पता चला कि 20 मई को होने वाली वोटिंग के लिए उनकी ड्यूटी फतेहपुर में लगा दी गई है। घरवालों ने कहा कि ड्यूटी कैंसिल करा दो, लेकिन खुशीराम नहीं माने। बोले- नहीं गया, तो सस्पेंड हो जाऊंगा। तबीयत खराब होने के बावजूद खुशीराम फतेहपुर चले गए। 20 मई की दोपहर खुशीराम के घर फतेहपुर से एक अधिकारी का फोन आया। उन्होंने बताया कि खुशीराम की तबीयत बिगड़ गई है। वे बेहोश हैं और हम उन्हें हॉस्पिटल ले जा रहे हैं। आप लोग जल्दी आ जाइए। 2 घंटे बाद फिर कॉल आया कि खुशीराम की इलाज के दौरान मौत हो गई। लोकसभा चुनाव में ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले खुशीराम अकेले नहीं हैं। सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही 54 कर्मचारियों की ड्यूटी करते हुए मौत हो गई। 33 मौतें तो वोटिंग के आखिरी दिन 1 जून को हुईं। मरने वालों में ज्यादातर होमगार्ड्स थे, जिनके परिवारों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। कुछ परिवार ऐसे हैं, जिन्हें सहारा देने वाला कोई नहीं बचा। उनकी आखिरी उम्मीद 15 लाख रुपए का सरकारी मुआवजा है, जो अब तक नहीं मिला है। उत्तर प्रदेश ही नहीं देश के दूसरे राज्यों में भी चुनाव ड्यूटी के दौरान कई कर्मचारियों की मौत हुई। दैनिक भास्कर ने चुनाव आयोग से इसकी जानकारी मांगी, लेकिन जवाब नहीं मिला। राज्यों में अधिकारियों से बात की, तो पता चला कि मध्यप्रदेश में 27, असम में 15, राजस्थान-छत्तीसगढ़ में 8-8, पंजाब में 7 और दिल्ली में 4 मौतें हुई हैं। इलेक्शन ड्यूटी के दौरान जिन कर्मचारियों की मौत हुई, उनके परिवार किस हाल में हैं, किसे मुआवजा मिल गया और कितनों का भुगतान अब तक अटका है, ऐसे सवालों के जवाब जानने दैनिक भास्कर ग्राउंड पर पहुंचा। शुरुआत होमगार्ड खुशीराम के घर से
2 जून को घर लौटने वाले थे, उनकी डेडबॉडी आई
होमगार्ड खुशीराम हरदोई के घेरवा गांव में पत्नी अनीता और बेटे हर्षित के साथ रहते थे। उनकी पहली ड्यूटी उत्तराखंड के पूर्णागिरी में लगी। यहां 19 अप्रैल को वोटिंग थी। 7 मई को आगरा गए। चौथे फेज, यानी 13 मई को उनकी ड्यूटी हरदोई में लगी। 44 डिग्री तापमान में लगातार ड्यूटी करने से 55 साल के खुशीराम की तबीयत खराब हो गई। इसके बावजूद पांचवें फेज के चुनाव, यानी 20 मई को उनकी ड्यूटी फतेहपुर में लगा दी गई। कच्चे मकान की दहलीज के कोने पर टंगी खुशीराम की तस्वीर दिखाते हुए उनकी पत्नी अनीता कहती हैं, ‘हरदोई से लौटने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ती जा रही थी। बेटे से दवा मंगवाई, लेकिन फायदा नहीं हुआ। 14 मई को पता चला कि उन्हें फतेहपुर चुनाव कराने जाना है।’ फतेहपुर जाते वक्त खुशीराम ने अनीता से कहा था कि 2 जून को लौट आऊंगा। चुनाव के बाद पोस्टिंग गांव के पास ही लगवा लूंगा। फिर कोई परेशानी नहीं होगी। मगर खुशीराम दोबारा घर नहीं लौट सके। उनकी जगह उनकी डेडबॉडी घर आई। 15 लाख रुपए मुआवजा मिलना था, कुछ नहीं मिला
इलेक्शन कमीशन के मुताबिक, लोकसभा चुनाव में देशभर के करीब 1.5 करोड़ कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई। ये अलग-अलग सरकारी विभागों के अधिकारी, टीचर्स, बैंककर्मी, अर्धसैनिक बल, पुलिस और होमगार्ड जवान थे। खुशीराम की मौत के बाद उनके परिवार की जिम्मेदारी बड़े भाई राम प्रसाद संभाल रहे हैं। वे नाराजगी जताते हुए कहते हैं, ‘चुनाव आयोग को भीषण गर्मी में इलेक्शन नहीं करवाना चाहिए था। इस मौसम में घर से बाहर निकलना भी आफत था, लेकिन लोगों को लगातार ड्यूटी पर भेजा गया।' क्या सरकार की तरफ से कोई मदद मिली? राम प्रसाद जवाब देते हैं, ‘कुछ नहीं मिला। मेरा भाई चला गया, उसका बेटा अकेले कैसे घर संभालेगा। थोड़ी-बहुत खेतीबाड़ी है, उसी से पेट पाल रहे हैं। सरकार ने 15 लाख रुपए देने की घोषणा की थी, लेकिन हमें एक रुपया तक नहीं मिला।’ खुशीराम को गुजरे एक महीना हो चुका है। घर के दरवाजे पर लगी खूंटी में उनकी वर्दी आज भी टंगी है। उसे देखकर पत्नी अनीता बार-बार रो पड़ती हैं। रायबरेली के होमगार्ड शिवशंकर चौधरी
ड्यूटी पर जहरीले कीड़े ने काटा, इलाज के दौरान मौत
रायबरेली के इसिया गांव में रहने वाले होमगार्ड शिवशंकर की भी चुनाव ड्यूटी के दौरान तबीयत बिगड़ी और उनकी मौत हो गई। शिवशंकर 14 अप्रैल को चुनाव ड्यूटी पर उत्तराखंड के नैनीताल गए थे। इसके बाद दूसरे चरण के चुनाव के लिए वहीं से 20 अप्रैल को नोएडा चले गए। नोएडा में जिस जगह पोलिंग पार्टी ठहरी थी, वहीं 21 अप्रैल की रात शिवशंकर को किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया। इससे उनके पैर में फोड़ा निकल आया। उन्होंने दर्द बढ़ने पर डॉक्टर को दिखाया, लेकिन जरा भी आराम नहीं मिला। शिवशंकर की बेटी सलोनी कहती है, ’पापा 26 अप्रैल को नोएडा में चुनाव ड्यूटी पर जा रहे थे। बस में बैठते ही उनके पैर में दर्द होने लगा। उनके दोस्तों ने पापा को नोएडा के प्राइवेट हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया। लेकिन कोई राहत नहीं मिली।' शिवशंकर की बड़ी बेटी की शादी हो चुकी है। वह दूसरी बेटी सलोनी के लिए रिश्ता देख रहे थे। चुनाव के बाद उसकी शादी करने की तैयारी थी, लेकिन सब बातें ही रह गईं। हमने सलोनी से पूछा कि क्या पिता की मौत के बाद कोई आर्थिक मदद मिली? सलोनी कहती हैं, ‘कुछ लोग पापा का नाम और बैंक खाता नंबर लिखकर ले गए हैं। जल्दी मुआवजा भेजने को बोले थे, लेकिन अब तक कुछ नहीं मिला है।’ मिर्जापुर के होमगार्ड कृष्णकांत अवस्थी
ड्यूटी से लौटे, खाना खाकर सोए, फिर नहीं उठे
उत्तर प्रदेश में पोलिंग स्टाफ की मौत के सबसे ज्यादा मामले मिर्जापुर में सामने आए। यहां ड्यूटी पर गए 23 होमगार्डों की गर्मी की वजह से तबीयत बिगड़ गई। सभी को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जिनमें से 6 जवानों की मौत हो गई। मिर्जापुर के संडवा गांव के होमगार्ड कृष्णकांत अवस्थी की भी लू लगने से मौत हुई थी। चुनाव के दौरान उनकी ड्यूटी जिला जज के यहां लगी थी। कृष्णकांत के बड़े भाई शशिकांत अवस्थी कहते हैं, ‘भैया सुबह 10 बजे ड्यूटी पर गए थे और रात करीब 10 बजे लौटे। वे देर रात खाना खाकर सोने चले गए और सुबह 8 बजे तक नहीं उठे। कृष्णकांत के डेथ सर्टिफिकेट में मौत की वजह हीट स्ट्रोक बताया गया। परिवार को अब तक किसी भी तरह की आर्थिक मदद नहीं दी गई है। UP में 54 पोलिंग स्टाफ की मौत, मदद सिर्फ 27 को मिली
इलेक्शन ड्यूटी के दौरान मरने वाले पोलिंग स्टाफ का डेटा और उन्हें मिलने वाली आर्थिक मदद के बारे में जानने हम उत्तर प्रदेश स्टेट इलेक्शन कमीशन के ऑफिस पहुंचे। यहां हमें असिस्टेंट चीफ इलेक्टोरल अफसर अरबिंद कुमार पांडेय मिले। वो ऑन कैमरा बात करने को राजी नहीं हुए। अरबिंद कहते हैं, ‘चुनाव खत्म होने के बाद हमने यूपी के सभी जिलों से पोलिंग कर्मचारियों की मौत से जुड़ी रिपोर्ट मंगवाई थी। राज्य में 54 कर्मचारियों की मौत हुई। इनमें से 27 के परिवार तक मदद पहुंचा दी गई है। 10 लोगों का पेमेंट अभी प्रोसेस में है।' '17 मृतकों की पूरी रिपोर्ट अभी उनके जिलों से नहीं आई है। इसलिए उनका कुछ नहीं हो पाया । संबंधित जिला प्रशासन जैसे ही जानकारी भेज देगा, हम उनके अकाउंट में पैसे भिजवा देंगे।’ इलेक्शन कमीशन के मुताबिक, जान गंवाने वाले कर्मचारियों में ज्यादातर होमगार्ड, सफाईकर्मी और वोटिंग कराने वाले कर्मचारी थे। इन सभी की 500 रुपए रोज के हिसाब से ड्यूटी लगाई गई थी। सभी को वोटिंग से 3 से 4 दिन पहले तय लोकसभा क्षेत्रों में पहुंचना था। UP के चीफ इलेक्टोरल अफसर बोले- 7 जुलाई से पहले मुआवजा दे देंगे
यूपी के चीफ इलेक्टोरल अफसर नवदीप रिणवा कहते हैं, 'यूपी में रिपोर्ट हुईं सभी मौतें नेचुरल डेथ की कैटेगरी में आती हैं, इसलिए सभी पीड़ित परिवारों को 15 लाख रुपए की मदद दी जाएगी। 7 जुलाई से पहले मदद राशि भेजने का टारगेट रखा गया है।' इलेक्शन कमीशन की गाइडलाइन के अनुसार, चुनाव ड्यूटी के दौरान पोलिंग स्टाफ की मौत होने पर दो तरह से मदद दी जाती है। पहला- कर्मचारी की बीमारी से या फिर प्राकृतिक मौत होने पर 15 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाता है। दूसरा- किसी भी तरह के उपद्रव या आतंकी हमले में पोलिंग स्टाफ की मौत होने पर 20 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी जाती है। भास्कर ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर को सवाल भेजे, जवाब नहीं आया
चुनाव ड्यूटी करते हुए देश में कितने पोलिंग कर्मचारियों की मौत हुई, कब तक पीड़ित परिवारों को मुआवजा मिल जाएगा, क्या तपती गर्मी और हीटवेव को देखते हुए चुनाव आगे के लिए टाला जा सकता था, दैनिक भास्कर ने ऐसे 6 सवाल चीफ इलेक्शन कमिश्नर राजीव कुमार को मेल के जरिए भेजे। 5 दिन बाद भी जवाब नहीं आया। हमने 19 और 20 जून को चीफ इलेक्शन कमिश्नर राजीव कुमार के ऑफिस में कॉन्टैक्ट भी किया। उनके ऑफिस से बताया गया कि आपके सवालों की कॉपी संबंधित डिपार्टमेंट को भेज दी गई है। इस पर कोई जवाब आता है, तो मेल पर दे दिया जाएगा। हमें बताया गया कि जल्दी जानकारी पाने के लिए डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर नितेश कुमार व्यास से संपर्क कर लीजिए। उन्हीं का सेक्शन चुनाव से जुड़ा डेटा और प्लानिंग का काम देखता है। हमने देशभर में पोलिंग स्टाफ की मौत के आंकड़े जानने के लिए डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर नितेश कुमार व्यास के ऑफिस में 20 से 22 जून तक कई बार संपर्क किया। उनके ऑफिस से जानकारी मिली कि वे मीटिंग में हैं, आप सोमवार 24 जून को फोन करके फिर कंफर्म कर लीजिए। सोमवार को कॉल करने पर उनके पर्सनल सेक्रेटरी ने बताया कि नितेश कुमार व्यास टूर पर बाहर चले गए हैं और 1 जुलाई तक लौटेंगे। तभी आपको डेटा मिल सकेगा। मध्यप्रदेश में 27, दिल्ली में 4 मौतें
इलेक्शन कमीशन से जवाब न मिलने पर हमने अलग-अलग स्टेट के ऑफिशियल्स से बात की। उनसे पूछा कि आपके राज्य में इलेक्शन ड्यूटी के दौरान कितनी मौतें हुई हैं और कितने परिवारों को मुआवजा मिल चुका है। मध्यप्रदेश के CEO अनुपम रंजन ने बताया कि चुनाव ड्यूटी के दौरान 27 कर्मचारियों की मौत हुई है। इनमें से 21 के परिवारों को केंद्र सरकार की तरफ से 15 लाख रुपए की मदद दी गई है। छत्तीसगढ़ में 8 कर्मचारियों की मौत हुई। सभी के परिवारों को मुआवजा मिल गया है। राजस्थान CEO प्रवीण गुप्ता के मुताबिक, प्रदेश में 8 मौतें हुई हैं, जिनमें से 6 परिवारों को मुआवजा मिल गया है। दिल्ली के CEO पी. कृष्णमूर्ति ने बताया कि 4 कर्मचारियों की मौत हुई है। सभी का मुआवजा अभी प्रोसेस में है। वहीं पंजाब के CEO सिबिन सी. ने 7 कर्मचारियों की डेथ की बात कही। इनमें से 5 के परिवारों को मदद पहुंचा दी गई है। दो की डिटेल नहीं मिली है। असम CEO अनुराग गोयल के मुताबिक, 15 कर्मचारियों की मौत हुई है। इनमें 10 के परिवारों को मदद दी जा चुकी है। गोवा CEO रमेश वर्मा ने बताया हमारे यहां इलेक्शन ड्यूटी के दौरान किसी स्टाफ की मौत नहीं हुई। यूपी पंचायत चुनाव में भी 1,621 मौतें हुईं, मुआवजा सिर्फ 60% को मिला
यूपी में 2021 में पंचायत चुनाव में ड्यूटी में लगाए गए 1621 टीचर्स की मौत हो गई थी। उनके परिवारों को मुआवजा पाने में काफी इंतजार करना पड़ा था। प्रदेश में 15 अप्रैल से 5 मई, 2021 तक पंचायत चुनाव हुए थे। प्राथमिक शिक्षक संघ ने 16 मई को CM योगी के नाम एक लेटर लिखा। इसमें बताया गया कि पंचायत चुनावों में ड्यूटी के बाद अब तक 1621 शिक्षकों और सहायक कर्मचारियों की COVID-19 से मौत हो चुकी है। शिक्षक संघ ने CM योगी आदित्यनाथ से पीड़ित परिवारों को 50 लाख रुपए और पीड़ित परिवार में किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग की थी। CM योगी ने इस पर जांच बैठा दी। 18 मई को बेसिक शिक्षा परिषद की तरफ से सफाई दी गई कि पंचायत चुनाव के दौरान कोरोना से सिर्फ 3 शिक्षकों की मौत हुई है। यूपी के प्रतापगढ़ जिले के लालगंज कस्बे में रहने वाली ऊषारानी के पति राजकरण की पंचायत चुनाव के दौरान मौत हो गई थी। वो लालगंज के पंडित राम अंजोर मिश्र इंटर कॉलेज में टीचर थे। 3 साल बाद भी उनके परिवार को मुआवजा नहीं मिला। ऊषा कहती हैं, ‘मेरे पति 22 अप्रैल, 2021 को चुनाव ड्यूटी पर गए थे। वहां से रात में घर लौटे तो उनकी सांस फूलने लगी। अचानक तबीयत बिगड़ी और कुछ देर बाद उनकी मौत हो गई। हमसे सिर्फ यही गलती हो गई कि कोरोना का टेस्ट कराए बगैर उनका अंतिम संस्कार कर दिया। इसी वजह से मुआवजा अटक गया।’ ‘हमने मुआवजे के लिए 2 बार रजिस्ट्रेशन करवाया, लेकिन दोनों बार रिजेक्ट कर दिया। कारण बताया गया कि कोरोना टेस्ट नहीं हुआ, इसलिए मुआवजा नहीं मिल सकता। घर में दो छोटे बच्चे हैं, उनकी स्कूल फीस और हमारा गुजारा करने में बहुत परेशानी हो रही है।’ 30 लाख रुपए देने का वादा पूरा नहीं हुआ
गवर्नमेंट टीचर्स के लिए काम रहे ऑर्गेनाइजेशन ऑल टीचर्स/ इम्प्लॉइज वेलफेयर एसोसिएशन (ATEWA) के अध्यक्ष विजय बंधु ने हमसे बात की। विजय कहते हैं, ‘1,621 तो अनुमानित संख्या थी, करीब 2000 से ज्यादा टीचर्स की मौत पंचायत चुनाव में हुई थी।’ सरकार तो सिर्फ 3 टीचर्स की मौत की बात कर रही थी? हमने विजय से पूछा। इस पर वो कहते हैं, ‘उस वक्त 1,621 शिक्षकों की मौत के आंकड़ा बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री सतीश चंद्र द्विवेदी ने झूठा बताया था। उनके विधानसभा क्षेत्र इटावा में ही 15 शिक्षकों की चुनाव ड्यूटी के दौरान मौत हो गई थी।’