दिल्ली का वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया। एक पुरानी और जर्जर सी फैक्ट्री। दीवारों पर जमी धूल, टूटी खिड़कियां और जंग लगी चादरें। बाहर से देखने पर यह किसी बंद पड़े गोदाम जैसी लगती है, जैसे बरसों से यहां कोई काम नहीं हुआ हो, लेकिन जैसे ही टीम अंदर दाखिल होती है, नजारा बदल जाता है। कहने को तो यहां कंस्ट्रक्शन से जुड़े काम होते हैं, लेकिन हकीकत में यह GST के फर्जी बिल बनाने का एक ठिकाना है। 50 लाख, 1 करोड़ या 20 करोड़ का फर्जी GST बिल चाहिए, यहां से मिल जाएगा। देश में हर महीने हजारों करोड़ की GST चोरी के मामले सामने आ रहे हैं। GST चोरी कैसे होती है और कौन लोग इसमें शामिल हैं, पढ़िए इस इंवेस्टिगेटिव रिपोर्ट में। यह स्टोरी दो पार्ट में होगी, आज पहला हिस्सा…। गुड्स एंड सर्विस टैक्स यानी GST एक ऐसा अप्रत्यक्ष कर है जिसे हम किसी भी सामान या सेवा पर खरीदते समय अदा करते हैं। कोई व्यापारी एक कंपनी से सामान खरीदता है और उस पर GST चुकाता है। बाद में वही व्यापारी जब उस सामान को बेचता है तो वह ग्राहक से GST वसूलता है। अब व्यापारी का फायदा यह है कि उसे दोबारा टैक्स नहीं देना पड़ता। वह पहले दिए गए टैक्स (खरीद पर) को अपनी देनदारी से घटा सकता है। इसे इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी ITC कहते हैं, इसी के जरिए GST फ्रॉड हो रहा है। ये तीनों ही अलग–अलग तरीके से फर्जी बिल बनाते हैं, सिलसिलेवार तरीके से पढ़िए पूरी कहानी…। भास्कर की टीम ब्रोकर बनकर इनसे मिली। लोकेशन : वजीरपुर इंडस्ट्रिलय एरिया किससे मिले : करण गोयल, फैक्ट्री मालिक पहली मीटिंग : सूत्रों से जानकारी मिलने के बाद हम दिल्ली के वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित एक फैक्ट्री में पहुंचे। हमें पता चला था कि, यहां GST के फर्जी बिल बनाए जाते हैं। फैक्ट्री के अंदर बने बड़े-बड़े हॉल्स में बर्तनों का निर्माण चल रहा है। सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए हम पहले माले पर पहुंचते हैं, जहां एक कॉरिडोर में दो बड़े केबिन नजर आते हैं। हम दूसरे कैबिन की ओर बढ़ते हैं और ठीक सामने बैठे शख्स से मिलते हैं। यह शख्स खुद को करण गोयल बताता है और दावा करता है कि वही फैक्ट्री का मालिक है। हम उसके सामने एक ब्रोकर की तरह पेश होते हैं और बताते हैं कि हमारे पास कंस्ट्रक्शन लाइन की कुछ ऐसी कंपनियां हैं जिन्हें करोड़ों के फर्जी GST बिल की जरूरत है। रिपोर्टर- हमारे पास पार्टी है, उन्हें GST का फर्जी बिल चाहिए गोयल- ठीक है जी, बिल में आपको क्या-क्या आइटम चाहिए… सीमेंट, सरिया, बदरपुर यही चाहिए ना ? रिपोर्टर- हां, कंस्ट्रक्शन के काम में जो-जो आता है गोयल- कोई दिक्कत नहीं है जी फिर… आपका कोई बाइफर्केशन है कि इतने लाख का ये चाहिए, इतने लाख का ये चाहिए या मिक्स करके कैसे भी दे दें… रिपोर्टर- मिक्स करके कैसे भी.. गोयल- आपका बंदा GST बिल कंपनी के नाम से लेगा या खुद के नाम से लेगा… जैसे कुछ बिल्डर हैं जो खुद के अकाउंट में लेते हैं…. रिपोर्टर- आपको आसान किसमें होगा। गोयल- सर, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। वो तो आपके कम्फर्ट के हिसाब से है। रिपोर्टर- मान लीजिए हरियाणा से आप हमारे लिए सीमेंट का 1 करोड़ का बिल बना रहे हैं गोयल- हां जी रिपोर्टर- सीमेंट पर GST तो 28% है, कितना कमीशन देना पड़ेगा, क्या सिस्टम होगा थोड़ा सा गाइड कर दीजिए गोयल- वो सर उसमें काफी सारी चीजें होती हैं। कभी-कभी पूरे टैक्स का अमाउंट भी देना पड़ता है, सामने वाली पार्टी को। कभी-कभी कुछ रिबेट भी दे देते हैं 2%–5%–7% (depending on date) कुछ को पुरानी डेट में बिल चाहिए होते हैं। मल्टीपल चीजें हैं। एक-डेढ़ घंटे बाद मैं सारी चीजें शॉर्ट करके बताता हूं। सर्विस आपको नोएडा में चाहिए न। रिपोर्टर- हां, नोएडा चाहिए रिपोर्टर- भाई इस काम में हम नए हैं, आपको तो आइडिया होगा हर चीज का। गोयल- सर, हमारा तो 30 साल से चल ही रहा है, फैमिली टाइप बिजनेस है। रिपोर्टर- अच्छा, बिल का आगे पकड़े जाने का, फर्जी वाले का कोई सिस्टम तो नहीं होता ना। गोयल- मैं आपको वही समझा रहा हूँ… दोनों तरीके की चीजें होती हैं। एक में 1 या 2% पर बिल मिल जाते हैं, जिसमें आगे रिस्क आ सकता है। इसमें किसी की कोई लायबिलिटी नहीं होती। वो बंदा भी सस्ते रेट पर बिल देगा और हम भी आपको सस्ता देंगे। एक बिल एक्सपेंसिव होता है, जो जेनुइन प्लांट (कंपनी) से ही आता है, उसमें कोई प्रॉब्लम आती है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी होती है। जिनको ज्यादा कमाई करनी है वो बिल्कुल फर्जी बिल लेते हैं, जो बहुत ही कम जैसे 1–2% पर मिल रहा है, इसमें बिल का पेमेंट सैटेल करते ही चैप्टर क्लोज हो जाता है। रिपोर्टर- 2% वाले सस्ते बिल के पकड़े जाने का कितना चांस है ? गोयल- इसकी कोई डेफिनेशन नहीं है। सट्टा कह लो या किस्मत कुछ भी कह लो। बात यहीं खत्म नहीं होती... करण की बातों से ये तो साफ हो गया था कि वो GST सिस्टम की कमजोरियों को न सिर्फ बारीकी से समझता है, बल्कि सालों से फेक बिल के धंधे में शामिल है। वो जानता है कि कमजोरी कहां है, और सिस्टम में किसे कैसे मैनेज करना है। दूसरी मीटिंग : 13 अगस्त 2025 — वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया करण गोयल से हमारी दूसरी मुलाकात वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया की उसी फैक्ट्री में होती है। पिछली मुलाकात में करण ने वादा किया था कि अगली मीटिंग मे साफ–साफ बताएगा कि वो कितने पर्सेंट पर GST बिल देगा, शर्तें क्या होंगी, और एक बार में कितनी रकम तक का GST बिल दे सकता है। रिपोर्टर- आदेश करिए सर गोयल- आप बताइए कैसे-कैसे करना है। सीमेंट जो है 28 फीसदी का है, उसका एडजस्टमेंट कन्फर्म होने में दो-तीन दिन का समय लगेगा। बाकी जितने आइटम हैं, जैसे, सरिया, डस्ट, 18 फीसदी के स्लेब में आते हैं। उनका हमारे पास एडजस्टमेंट है। 20 करोड़ का बिल भी चाहिए तो मैनेज हो जाएगा। 5 पर्सेंट कमीशन वाला बिल लेंगे तो आगे कभी भी GST का कोई नोटिस आता है, या लायबिलिटी निकलती है तो खर्चा हम भुगतेंगे। रिपोर्टर- जो बिल दे रहा है। गोयल- और अगर उससे हम 3 पर्सेंट में लेते हैं तो फिर उसकी कोई लायबिलिटी नहीं होगी। जो भी आएगा, वो पार्टी भुगतेगी। 3 और 5 की हमारी कॉस्टिंग है। बिलिंग मेरी ही फर्म से जाएगी। पेमेंट भी मेरे पास आएगा और मैं अपना कमीशन काटकर कैश आपको वापस कर दूंगा। रिपोर्टर- ये 3 और 5 पर्सेंट वाले बिल में क्या फर्क है ? दूसरा व्यक्ति- फर्क आप समझे नहीं। 3 पर्सेंट वाले में कल कोई आपको किंतु-परंतु होता है तो कोई जिम्मेदारी नहीं। पैसा लेने के बाद हम आपको पहचानते नहीं । रिपोर्टर- वो तो समझ गया मैं कि 5 पर्सेंट में लायबिलिटी लेंगे, कोई लफड़ा होता है तो जो खर्चा आएगा वो आप भुगतेंगे? गोयल- सैटलमेंट करेंगे। नोटिस खत्म करवाने की गारंटी हमारी है। करण बताता है कि वह 5% कमीशन पर ऐसी कंपनियों के फर्जी GST बिल मुहैया करवा सकता है, जिनकी GST प्रॉपर तरीके से भरी गई होती है, यानी कागजी तौर पर सब कुछ वैध दिखाई देता है। सामने वाली पार्टी को बस बिल लेना है और बेझिझक रिटर्न फाइल कर देना है। उसकी बातों में जो सबसे खास बात थी, वो ये कि – “अगर कोई दिक्कत आती है—चाहे GST डिपार्टमेंट से हो या किसी और एजेंसी से—पूरी जिम्मेदारी उसकी रहेगी।” यानि करण गोयल केवल बिल ही नहीं देता, बल्कि जांच और कार्रवाई से सुरक्षा की गारंटी भी देता है। वहीं दूसरी स्कीम में करण ने बताया कि वह 3% कमीशन पर भी फर्जी GST बिल देता है, लेकिन उसमें उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती। जांच या कार्रवाई होने पर वह क्लाइंट की मदद नहीं करेगा। "करण की इन बातों से साफ होता है कि वह सिर्फ एक बिचौलिया नहीं, बल्कि GST रैकेट का बड़ा खिलाड़ी है। बातचीत के दौरान, पहले वह बार-बार यह जताने की कोशिश करता है कि वह अपनी फर्म से ही बिल मुहैया करवाएगा। लेकिन जब टीम ने जोर दिया कि सभी बिल वाकई उसकी फर्म के ही होंगे, तो उसने बात बदलते हुए कहा कि बिल 'जानने वालों की कंपनियों' से दिलवाएगा—जो असल में उसके रिश्तेदारों की ही कंपनियां हैं। यही सबसे बड़ा सवाल उठता है..." क्या कोई भी वैध और सक्रिय कंपनी इतने बड़े अमाउंट में फर्जी GST बिल जारी कर सकती है? असल में करण "जानने वालों की कंपनी" की आड़ में उन शेल कंपनियों का जाल चला रहा है, जिन्हें या तो उसने खुद खड़ा किया है या जिनको वो पर्दे के पीछे से चलाता है। दूसरी मुलाकात GST बिलों का रैकेट चलाने वाले राजीव से हुई…. पड़ताल में आगे हमारी मुलाकात मनोज मिश्रा नाम के एक शख्स से हुई। सूत्रों ने हमें बताया था कि मनोज के संपर्क में GST की फर्जी बिलिंग से जुड़े कई लोग हैं। इसलिए हमने मनोज को फोकस किया। मनोज ने भास्कर रिपोर्टर को बताया कि वह राजीव कुमार झा नाम के शख्स को जानता है, जो फर्जी GST बिलों का बड़ा रैकेट चलाता है। मनोज ने फोन पर हमारी बात राजीव से करवाई। राजीव खुद को एक टैक्स कंसल्टेंट बताता है। हम उससे उसके ऑफिस में मिलने की बात कहते हैं, लेकिन शायद राजीव पहले यह परखना चाहता था कि वह जिस शख्स से बात कर रहा है, क्या वह सचमुच “पार्टी” है या नहीं। इसीलिए उसने रिपोर्टर को रोहिणी के एक रेस्टोरेंट में बुलाया। 23 अगस्त, दोपहर करीब 3 बजे। हमारी टीम राजीव से उसके बताए रेस्टोरेंट में मिलती है। राजीव – अभी रिक्वायरमेंट क्या है आपके पास, बिल्डिंग मटेरियल से रिलेटेड है? रिपोर्टर – हां, अभी हमें, सात करोड़ का बिल चाहिए… इतना तो पता है कि एक साथ सात करोड़ का मिलेगा नहीं। राजीव – क्यों नहीं मिलेगा? रिपोर्टर – ये तो अब आप बताएंगे राजीव– दो कंपनी से, चार कंपनी से, पांच कंपनी से मिलेगा। बिल का आप टेंशन छोड़ दो, कितने का भी मिलेगा… रिक्वायरमेंट इस महीने कितने का है, जितना उनका टैक्स बन रहा होगा GST का? रिपोर्टर – इस महीने ढाई करोड़ का। राजीव– उस हिसाब से स्लैब बनाएंगे… इस महीने इतने का चाहिए, इतने का मेरा GST पोर्टल दिखा रहा है, तो इतने का बिल… रिपोर्टर – कल बात हुई थी इनसे कि लिस्टिंग कर लेना, तो टोटल इस महीने हमें ढाई करोड़ का चाहिए बिल। राजीव – अभिषेक जी, कल भी आपको एक बात फोन पर बताई थी कि 100% असली पर जाओगे तो काम नहीं कर पाओगे। क्योंकि रेट ही जस्टिफाई नहीं हो पाएगा। बोलोगे कि जहां से सीमेंट आ रही है वहीं से… वो तो मिलेगा नहीं। हम जो बिल देते हैं, लोगों को वो "cancel by taxpayer" होता है। एक भी बोगस फर्म का नहीं होता, जैसे, ‘फर्म किसी का है, बिल कोई काट रहा है, इनपुट पीछे से कुछ लगा नहीं रहा है।’ cancel by taxpayer होगा, उसमें डिपार्टमेंट से ऊपर से कैंसिल कराकर दिया जाएगा। छः महीने बाद, आठ महीने बाद—मतलब कि लिमिट जब हमारा पूरा हो जाएगा—उसके बाद डिपार्टमेंट से कैंसिल कराकर। जैसे मैंने आपको ABC… से दिया, वो डिपार्टमेंट से कैंसिल कराकर भेज दूंगा। उससे क्या होगा? सामने वाले का इनपुट कभी नहीं मरता। अगर फर्म सस्पेंड हो जाएगी तो डिपार्टमेंट इनुपट ब्लॉक कर देगा। मेरा फर्म है, मैंने डिपार्टमेंट जाकर अपनी मर्जी से कैंसिल कराया। अगर डिपार्टमेंट बंद करता है तो आउटपुट मैच करके फिर बंद करता है। आप एप्लीकेशन देते हो डिपार्टमेंट को, ऑनलाइन एप्लाय करते हो… ऐसे में सामने वाले का इनपुट कभी ब्लॉक नहीं होता। अभी मार्केट में यही चल रहा है। आपको बता रहा हूं, वो "पर्चे वाला सिस्टम" खत्म हो गया, पहले चलता था ना। अब तो GST लेना भी काफी मुश्किल हो गया है। राजीव- Cancel by taxpayer बोलते हैं फर्म को। उससे आपको बिल मिलेगा, उसमें HSN जुड़ा होगा सारा… बिल्डिंग मटेरियल से रिलेटेड… मिल जाएगा। रिपोर्टर – तो चलता यही है ना? राजीव – चलता यही है। आपको भी ज्यादा टेंशन नहीं है, मुझे भी टेंशन नहीं है। रिपोर्टर – ये जो आप बता रहे हैं, cancel… राजीव– Cancel by taxpayer। जो टेक्सपेयर होता है, जिसके नाम पर GST है, वो खुद कैंसिल करता है GST डिपार्टमेंट से। रिपोर्टर – काम करने के बाद। राजीव – जैसे एक कंपनी की पांच करोड़ की लिमिट हो गई। पांच करोड़ के बाद GST ऑडिट हो जाएगा। डिपार्टमेंट वाला बोलेगा कि भाई पांच करोड़… पहले ही कैंसिल करा लो। डिपार्टमेंट के लोग इसमें शामिल होते हैं। रिपोर्टर – सेंटिंग होती है राजीव – हां, नहीं तो कैंसिल कैसे करेगा। आपका अगर दस हजार का फर्क है ना, तो आप कैंसिल नहीं कर सकते। पहले आपको पेमेंट करना है दस हज़ार रुपए, फिर जाकर कैंसिल कर सकते हैं। रिपोर्टर – ये थोड़ा समझाइए न… राजीव – जैसे मेरे ग्रुप में मल्टीपल कंपनी हैं। मानो दस कंपनी बनाई… आपके नाम, आपके नाम, आपके नाम। एक से बिल कटा, पांचवीं कंपनी से यहां इनपुट आया… फिर छठे से आया, फिर सातवें से आया। मतलब कि उसके पीछे इनपुट लगाना होता है, तभी तो आप रिटर्न फाइल कर पाओगे। या तो आप टैक्स पे करो, या उसे इनुपट से एडजस्ट करो। हमारे दस लेयर हैं, जहां से इनपुट उस कंपनी में आता है। यहां से बंद हुआ तो, पहला जो चैन है वही बंद हो गया तो आगे कोई दिक्कत ही नहीं होगी। रिपोर्टर – फिर उसके बाद कितना कमीशन रहेगा? राजीव– नहीं-नहीं, कमीशन तो हमारा बिल पर रहेगा। एंट्री और कैश का खर्चा जो एंट्री आएगी, उस पर रहेगा। रिपोर्टर – सीमेंट पर अभी 28 प्रतिशत है। राजीव – 28 प्रतिशत है। आपको बिल मिलेगा 3 रुपए 50 पैसे के खर्चे पर। यानी साढ़े तीन फीसदी कमीशन लगेगा। सीमेंट–सरिया सबका एक जैसा है। 28% / 18% जो भी है। अगर एंट्री होगी तो उसका खर्चा आएगा। क्योंकि बाजार में कैश का डेली का रेट है, कभी 40 पैसा, कभी 45 पैसा, कभी 50 पैसा। वो आप पता कर लेना। आप बोलोगे तो भाई, जो साढ़े तीन रुपए का रेट है उसमें अगर मार्केट में कैश का 50 पैसे तो 25 पैसे आपको इधर से एडजस्ट करके और 25 पैसे और आपको देना होगा। तो आपका बिल पड़ेगा 3 रुपए 25 पैसे। इससे ज़्यादा कुछ गुंजाइश है ही नहीं। राजीव – अगर आपका एक करोड़ का बिल है, तो साढ़े तीन लाख आपका कट जाएगा… रिपोर्टर- साढ़े तीन परसेंट कमीशन है राजीव एक टैक्स कंसल्टेंट है, लेकिन उसकी आड़ में फर्जी बिलिंग और इनपुट क्रेडिट का रैकेट चला रहा है। उसे पता है कि करोड़ों के बिल अलग-अलग कंपनियों के नाम पर बांटकर कैसे दिखाए जा सकते हैं। वह जानता है कि हर एक बिल, जो “cancel by taxpayer” प्रक्रिया से बाद में सरकारी रिकॉर्ड से हटा दिया जाता है, व्यापारी का इनपुट कभी ब्लॉक नहीं होने देता। इनपुट अलग-अलग कंपनियों के जरिए आसानी से एक व्यापारी तक पहुँच जाता है, वह भी बिना किसी असली माल के। इसके बाद व्यापारी आसानी से GST रिटर्न फाइल कर देता है। राजीव के मुताबिक यही तरीका है, जिससे फर्जी बिल और GST क्रेडिट को कानून की निगरानी से बचाया जा सकता है। फिलहाल यह तरीका मार्केट में आम तौर पर इस्तेमाल हो रहा है और इसमें केवल कमीशन और नकद खर्च सही से एडजस्ट करना होता है। ITC के जरिए हो रहा फ्रॉड GST में जब भी कोई नंबर लिया जाता है, उस नंबर से हम बिजनेस करते हैं। इसके कैंसिलेशन के दो तरीके होते हैं। पहला, व्यापारी खुद जाता है और एप्लीकेशन लगाता है कि मेरा बिजनेस डिस्कंटीन्यू हो गया है तो मैं इसको बंद कर रहा हूं। दूसरा ऑप्शन होता है अगर मैं नॉन फाइलर हो जाता हूं, तो उसमें सुओ मोटो कैंसिलेशन हो जाता है। आज मैंने नंबर लिया और मैंने फर्जी बिलिंग कर दी और उसके एक साल या छह महीने के अंदर आपने बिजनेस करके अपना कैंसिलेशन करा दिया है, तब तक डिपार्टमेंट आपके तरीके को समझ नहीं पाता कि किस तरह का आपने व्यापार किया। आप सीधा बोलते हो कि मैंने एक बिजनेस किया था और लोगों ने मुझे लॉस दिया है, जिस कारण से मैं अपना बिजनेस बंद कर रहा हूं। समस्या तब मालूम चलती है जब 2 साल बाद एसेसमेंट होता है, तब पता चलता है। उस सब में व्यापारी एक ऑप्शनल लेता है कि मुझे नहीं पता कि ये जो नंबर है, वो कैंसिल बाई डीलर है। इसमें कोई फ्रॉड नहीं है, न पूरा टैक्स पे किया है, न जमा कराया हुआ है। न इसमें कोर्ट के जजमेंट हैं, जिसमें कोर्ट ने कहा है कि डीलर ने अगर खुद जमा कराया है, उसकी जो गलती है, जिसको माल सप्लाई किया है, उसको ना दिया जाए। इस तरह से लोग स्कैम कर सकते हैं और फर्जी आईटीसी पास ऑन कर सकते हैं। अतुल कुमार शर्मा, GST एडवोकेट भास्कर ने इस मामले में सरकार का पक्ष जानने के लिए मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस को सवाल ईमेल किए हैं। अभी तक मिनिस्ट्री की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है। जैसे ही रिप्लाई आएगा, हम खबर में अपडेट करेंगे। नोट : GST की दरें अब बदल चुकी हैं। 12% और 28% की पुरानी दरों को हटाकर 5% और 18% की दो नई दरें बनाई गई हैं। ये 22 सितंबर से लागू होंगी। ................................................. कल पढ़िए स्टोरी का अगला हिस्सा अगले पार्ट में हमारी मुलाकात एक कॉन्ट्रेक्टर से हुई, जिसने GST चोरी का एक और नया तरीका बताया। GST चोरी की मोडस ऑपरेंडी क्या है, और कैसे सरकार को चूना लगाया जा रहा है, इसका खुलासा कल की रिपोर्ट में होगा।