खेल के मैदान में जब गेंद दौड़ती है, तो उसके पीछे दौड़ते शब्दों का जादू अब लगभग गायब हो चुका है. एशियन गेम्स से लेकर भारत-वेस्टइंडीज सीरीज तक, टीवी स्क्रीन पर मैच देखते हुए दर्शकों के कानों में पड़ रही कमेंट्री अब सुकून देने के बजाय सिरदर्द बन रही है. भाषा की मर्यादा टूट चुकी है और खेल की गहरी समझ की जगह नकली उत्साह व नारेबाजी ने ले ली है. गलत आंकड़े, आधे-अधूरे वाक्य और सतही ज्ञान के बीच दर्शक मैदान देखकर भी शब्दों के अकाल से जूझ रहा है.