लॉर्ड्स. भारत और इंग्लैंड के बीच चल रही टेस्ट सीरीज के दौरान क्रिकट के इतिहास से रुबरू होने का मौका मिला. लॉर्डस म्यूजयम में रखा एक बैट 1720 में इस्तेमाल किया गया था. क्रिकेट बैट का इतिहास 17वीं शताब्दी से शुरू होता है, जब यह हॉकी स्टिक जैसा दिखता था. शुरुआती बल्ले विलो लकड़ी से बनाए जाते थे और उनका आकार अनियमित होता था. 18वीं शताब्दी तक, बल्ले का आकार थोड़ा चपटा और धारदार होने लगा. 19वीं शताब्दी में, बल्ले का निचला हिस्सा सपाट हो गया और पूरा बल्ला एक ही लकड़ी से बनने लगा. 20वीं शताब्दी में, ओवर-आर्म बॉलिंग के कारण बल्ले मजबूत बनाए जाने लगे और उनका आकार भी चौड़ा होने लगा. इसके बाद 1835 में क्रिकेट बैट की लंबाई 38 इंच तय की गई जो आज तक बरकरार है. फिर 1853 से विलो लकड़ी से बनने वाले बल्ले के हैंडल को अलग केन लकड़ी से बनाया जाने लगा जो कि बल्ले से जोड़ दिया जाता था जबकि उससे पहले लकड़ी की पूरी एक पट्टी से एक बैट बनता था. जबकि 1864 आते-आते बल्ले के हैंडल में रबर ग्रिप भी लगाना भी शुरू कर दी गई जो आमतौर पर भारत से ही आती थी. आज शानदार बल्लों के साथ-साथ बल्लेबाज के पास सुरक्षा के कई सामान होते हैं जो कि पुराने जमाने में नहीं हुआ करते थे.