‘मैं देश की जानी-मानी कंपनी हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी HP में ह्यूमन रिसोर्स मैनेजर हूं। 2500 लोगों की टीम को लीड करता हूं, लेकिन इन सब के बीच कई बार ठहरकर सोचता हूं कि वो भी क्या दिन थे, जब पाई-पाई को मोहताज था। पापा और मम्मी दोनों दिहाड़ी मजदूर थे। पापा को तो आज भी फोन रिसीव करने नहीं आता है। जब मैं अपने साथ के लोगों को पिता से बात करते हुए देखता हूं, तो पापा के बारे में सोचकर बहुत अखरता है।' दशरथ पिता की बातों का जिक्र करते हुए भावुक हो जाते हैं। कहते हैं, ‘आज भी पापा रोज सुबह उठकर खेत में जाते हैं। पूरे दिन वहीं मजदूरी करते हैं। बचे समय में गाय चराते हैं। दशरथ बेहद गरीब परिवार से आते हैं। एक समय उनके सिर पर न छप्पर था, न खाने को खाना। जब उनका एडमिशन आईआईटी कानपुर में हुआ, तो पैसे के अभाव में उसे भी छोड़ना पड़ा। सरकारी स्कूल में उधार की किताबें और कपड़ों के सहारे आठवीं और फिर स्कॉलरशिप से बैचलर करने वाले दशरथ की पूरी कहानी जानने के लिए मैं मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल पहुंचा हूं। अपनी चमकती हुई ब्लैक सेडान कार से दशरथ मुझे लेने के लिए आए हैं। औपचारिक स्वागत के बाद हमारी बातचीत शुरू होती है। उनकी कहानी सुनते हुए मुझे ऐसा लग रहा है कि सामने फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ी जा रही है। दशरथ बताते हैं, ‘पापा 9 भाई-बहन थे। जब दादा ने जमीन का हिस्सा लगाया, तो सबके हिस्से दो-दो एकड़ जमीन आई। मेरे पिता को छोड़ बाकी सभी भाई पढ़े-लिखे थे। पाप को तो नोट गिनने भी नहीं आता था। आप ही बताइए, कैसे उनकी जिंदगी गुजरी होगी। सुबह उठना, खेत जाना, दोपहर में गाय चराना और रात को खाना खाकर सो जाना। यही उनकी जिंदगी थी। आज भी वे वैसे ही रहते हैं। मां बताती हैं कि जब वह ब्याहकर आईं, तो उनकी उम्र महज 12 साल थी। शादी के एक-डेढ़ साल के भीतर मैं पैदा हो गया। मां थोड़ी समझदार थीं। पढ़े-लिखे परिवार से थीं। लेकिन यहां तो कुछ था ही नहीं। दिन में खाते, तो रात के लिए सोचते। रात में खाते, तो अगली सुबह के लिए। बरसात के दिनों में छप्पर टपकता रहता था। मैं स्कूल जाना चाहता था, लेकिन मां-पापा बीच रास्ते से ही वापस लौटा लाते थे। मां-पापा का मानना था कि खेत में काम करने जाऊं, ताकि दो रुपए मिलें। स्कूल जाने से क्या हो जाएगा। मेरी उम्र तब 5 साल थी। इतनी कम उम्र में दूसरी-तीसरी क्लास के बच्चों के सवाल हल कर देता था। दशरथ अपनी कुछ पुरानी तस्वीरें दिखाते हैं। कहते हैं, ‘कौन बच्चा होगा, जो मां-बाप से छिपकर स्कूल जाता होगा। मैं गया हूं। पहली से पांचवीं तक एक ही टीचर पढ़ाने के लिए आते थे। जो मैम मुझे पढ़ाने के लिए आती थीं, उनके बच्चे नवोदय विद्यालय में पढ़ते थे। मेरे साथ अच्छा ये हुआ कि मैम ने मुझे नवोदय की तैयारी वाली किताबें देनी शुरू कर दीं। मैं तैयारी करने लगा, लेकिन मां कहां मानने वाली थीं। वो आए दिन कहती थीं कि खेत में काम करो। टीचर मुझे पढ़ाने के लिए बैठतीं और मां मुझे स्कूल से खेत बुला लेतीं। एक दिन जब मेरी टीचर को पता चला, तो उन्होंने मां को घर आकर समझाया। कहा- इसे पढ़ने दीजिए, दो साल बाद इसकी फीस नहीं लगेगी। बाद में हर महीने 10 हजार की नौकरी लग जाएगी। तब मां ने माना। बाद में मेरा एडमिशन नवोदय में हो गया।’ दशरथ का बचपन स्कूल जाने की जिद और मां के साथ मजदूरी करने में बीता। वह बताते हैं, ‘आसपास के इलाकों में जहां-जहां घर बनते थे, मां मजदूरी करने के लिए जाती थीं। सुबह-सुबह वह दिहाड़ी करने के लिए निकल जाती थीं। गांव के पास ही लोकल मार्केट था- मुल्ताई। आम तौर पर मम्मी वहीं मजदूरी करती थीं। छुट्टी के दिन या रविवार को मां मुझे भी अपने साथ रेत-सरिया ढोने के लिए ले जाती थीं। मां के दोनों हाथ गांठ और छाले से पटे होते थे। आज जब इन सब चीजों को याद करता हूं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मां को मर्दों के बीच रेत से भरी टोकरी माथे पर लेकर दूसरे-तीसरे माले तक लेकर जाना होता था।’ दशरथ को एक वाकया याद आ रहा है। कहते हैं, ‘तीसरी-चौथी क्लास में था, तो स्कूल के बच्चे मुझे चिढ़ाते थे। कहते थे- तुम्हारी मम्मी तो बाहर मर्दों के साथ काम करती हैं। देर रात तक बाहर रहती हैं। मुझे उस वक्त तो इस बात का मतलब नहीं पता था कि मर्दों के साथ काम करने में अलग क्या है? सोचता था कि आखिर बच्चे ऐसा क्यों कह रहे हैं। आज समझ में आता है कि वह मेरी मां के चरित्र पर सवाल उठा रहे थे।’ दशरथ अपने नवोदय के दिनों का किस्सा बताते हैं। कहते हैं, ‘मैं गांव का पहला बच्चा था, जिसका नवोदय में एडमिशन हुआ था। स्कूल में हर हफ्ते रविवार को सभी के मां-बाप मिलने के लिए आते थे। अपने बच्चों के लिए चॉकलेट-बिस्किट लेकर आते थे। मुझे याद है- मां सालभर, छह महीने में एक बार आ जाती थीं। मुझे पांच-दस रुपए दे देती थीं। तब बहुत रोना आता था। दशरथ कहते हैं, ‘मां को उम्मीद थी कि 12वीं के बाद मेरी नौकरी लग जाएगी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। घर में तो समझिए कि मातम पसर गया कि पढ़-लिखकर भी क्या ही कर लिया। मुझे याद है- इसी दौरान गांव में एक प्रचार गाड़ी आई थी। मैंने उसके ड्राइवर से कहा- मैं नवोदय विद्यालय के सेंटर्ल जोन का टॉपर हूं। दसवीं और बारहवीं में 90% से ज्यादा मार्क्स हैं, मेरा एडमिशन हो जाएगा? ड्राइवर ने डायरेक्टर से बात कराई। अगले दिन डायरेक्टर मेरे गांव आए। इसके बाद चार साल तक मुझे रहने-खाने और पढ़ने पर एक पैसा भी नहीं देना पड़ा। दरअसल मेरा दाखिला राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय यानी RGPV में बीटेक के लिए हो गया। मैंने अपनी यूनिवर्सिटी के 250 कॉलेजों में टॉप किया। मुझे गोल्ड मेडल मिला था। इंजीनियरिंग के दौरान ही ‘गेट’ क्वालिफाई किया। मास्टर्स में आईआईटी कानपुर में दाखिल मिल रहा था, लेकिन फीस के अभाव में पढ़ाई नहीं कर पाया। सच बताऊं, मैंने तो गेट की परीक्षा ही इसलिए दी थी कि मेरी नौकरी लग जाए। घर की जो स्थिति थी, उससे हर रोज रूबरू होना पड़ता था। लगता था, इस गरीबी में जिंदगी कैसे कटेगी। देश की कई कंपनियां गेट क्वालिफाई करने वालों को सीधे जॉब ऑफर करती हैं, लेकिन मुझे दो महीने तक कोई ऑफर नहीं आया। मैंने कर्ज लेकर आईआईटी कानपुर में एडमिशन प्रोसेस किया। अब और फीस के पैसे नहीं थे। मेरा एडमिशन कैंसिल हो सकता था, भगवान की मर्जी देखिए कि इसी दौरान एचपीसीएल में सिलेक्शन हो गया। जीवन के 25 साल मैंने अभाव में बिता दिए, लेकिन पढ़ा-लिखा नहीं होता, तो मां-बाप की तरह मैं भी दिहाड़ी मजदूरी कर रहा होता। जब गेट क्वालिफाई करने के बाद HP में नौकरी लगी, तब मैंने लोन लेकर बहन को पढ़ाया। शादी कराई। गांव में दो मंजिला मकान बनवाया।’