24 फरवरी 2020, रात के 10 बज रहे थे। मैं डीजे का काम करके पापा के साथ घर लौटा। बड़ा बेटा बीमार था। आस-पास की दवा दुकानें बंद थीं। मैं बाइक लेकर पापा के साथ दवा लाने के लिए थोड़ा दूर निकल गया। हम मेडिकल स्टोर पहुंचते, उससे पहले ही अचानक सामने से 250 लोगों की भीड़ ने हमें घेर लिया। उनके हाथ में पत्थर, लाठी-डंडे और छोटे-मोटे हथियार थे। वे हमें पत्थरों से मारने लगे। हमारी बाइक जला दी। पापा के सिर पर ताबड़तोड़ लाठियां मार रहे थे। इसके बाद मैं बेहोश हो गया। तीन दिन बाद 27 फरवरी को जब होश आया तो मैं अस्पताल में था। उसी दिन मुझे पता चला कि पापा नहीं बचे। भीड़ ने उनको पीट-पीटकर मार डाला। दिल्ली के शाहदरा की तंग गलियों में रहने वाले मोनू ये किस्सा बताते हुए सिहर उठते हैं। अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहते हैं- ‘जिन लोगों ने हमला किया, सभी बाहर के थे। हम पुलिस से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन कोई बचाने नहीं आया।’ मोनू 2020 के दिल्ली दंगों की चपेट में आ गए थे। 23 फरवरी से 26 फरवरी तक चले दंगों में 53 लोगों की जान गई और 250 से ज्यादा जख्मी हो गए। मरने वालों में 38 मुसलमान और 15 हिंदू थे। करीब 800 दुकानें जला दी गईं। 500 से ज्यादा घरों को आग के हवाले कर दिया गया। ‘दिल्ली के महाकांड’ सीरीज के चौथे एपिसोड में कहानी ट्रम्प के भारत आने और दिल्ली में हुए दंगों की… 10 दिसंबर 2019 की बात है। हंगामों के बीच लोकसभा से सीएए यानी सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट पास हो गया। इसके पक्ष में 311 वोट पड़े और विपक्ष में 80 वोट। 11 दिसंबर को यह बिल राज्यसभा से भी पास हो गया। राज्यसभा में इसके पक्ष में 125 वोट पड़े और विपक्ष में 99 वोट। इस कानून के मुताबिक 31 दिसंबर 2014 या उससे पहले से भारत में रहने वाले अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता मिलेगी। इसमें मुस्लिमों को शामिल नहीं किया गया। सदन से सीएए के पास होते ही देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन होने लगते हैं। JNU, जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र सड़कों पर उतर गए। 15 दिसंबर 2019 को दिल्ली के शाहीनबाग में मुस्लिम महिलाएं धरने पर बैठ गईं। पुलिस और सरकार ने धरना-प्रदर्शन खत्म कराने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। सुप्रीम कोर्ट ने शाहीनबाग में धरना खत्म कराने के लिए ऑब्जर्वर भी भेजे, लेकिन वो वहां से नहीं हटीं। सीएए का विरोध और सपोर्ट ऐसे वक्त में हो रहा था, जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव हो रहे थे। बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियां सीएए के सपोर्ट में थीं। आप और कांग्रेस जैसी पार्टियां इसके विरोध में। 8 फरवरी को दिल्ली में वोटिंग हुई और वोटों की गिनती 11 फरवरी को। आम आदमी पार्टी को 62 और बीजेपी को 8 सीटें मिलीं। पिछली बार की तरह इस बार भी कांग्रेस का खाता नहीं खुला। दिल्ली चुनाव के नतीजों के 11 दिन बाद। 22 फरवरी 2020, शनिवार का दिन। रात करीब 10 बजे जाफराबाद इलाके में कुछ महिलाएं सीएए के विरोध में धरने पर बैठ गईं। ट्रैफिक डिस्टर्ब हो गया। पुलिस ने समझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। अगले दिन यानी, 23 फरवरी को दोपहर 1.22 पर बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। उन्होंने लिखा- ‘आज ठीक तीन बजे। जाफराबाद के ठीक सामने मौजपुर चौक की रेड लाइट पर सीएए के समर्थन में डंके की चोट पर हम लोग सड़क पर उतरेंगे।’ थोड़ी देर बाद कपिल मिश्रा, सीएए सपोर्टर्स के साथ मौजपुर में जाकर बैठ गए। दोनों तरफ लोगों के बैठने से ट्रैफिक और फंस गया। पुलिस के समझाने पर कपिल मिश्रा मान गए, लेकिन जाते-जाते बोल गए- ‘ट्रम्प के जाने तक तो हम शांति से जा रहे हैं, लेकिन उसके बाद… अगर रास्ते खाली नहीं हुए तो, हमें रोड पर आना पड़ेगा।’ दरअसल, अगले दिन यानी 24 फरवरी को दिल्ली में अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प आने वाले थे। 23 फरवरी की शाम को सीएए के कुछ समर्थक फिर से जाफराबाद पहुंच गए। इस बार दोनों तरफ से गहमागहमी होती है और पत्थर चलने लगते हैं। यहां से उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में हिंसा शुरू हो जाती है। दुकानें जलाई जाती हैं। गाड़ियां जलाई जाती हैं। पेट्रोल पंप आग के हवाले कर दिए जाते हैं। डीसीपी जख्मी हो जाते हैं। हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल की अस्पताल में मौत हो जाती है। अगले दिन यानी 24 फरवरी को ट्रम्प भारत पहुंचते हैं। पहले वे अहमदाबाद पहुंचते हैं, फिर आगरा होते हुए शाम को दिल्ली। इधर दिल्ली में चीख-पुकार मची हुई है। ट्रम्प के वापस अमेरिका लौटने तक दिल्ली दंगों की आग में जलती रही। कुल 53 लोगों को जान गंवानी पड़ी। उत्तर पूर्वी दिल्ली के कर्दमपुरी में एक छोटे से घर में रहने वालीं किस्मतून ने दिल्ली दंगों में अपना बेटा खो दिया। 23 साल का फैजान गाजीपुर मुर्गा मंडी में काम करता था। उस दिन को याद करते हुए किस्मतून बताती हैं- ‘CAA के खिलाफ प्रोटेस्ट में औरतें बैठती थीं, हमें भी जाना पड़ता था। 24 तारीख को मैं 3 बजे गई थी। फैजान काम करने गया था। वो जब घर आया तो लड़ाई-झगड़े का शोर मचने लगा। मैं इधर से लौटी और वो उधर दूसरी गली से मुझे ढूंढने चला गया। पता नहीं कैसे वो पुलिस के हाथ लग गया। किस्मतून बताती हैं- ’बेटा बेहोश पड़ा था। पुलिसवालों ने पहले उसे पीटा, फिर उसे जबरदस्ती गाड़ी में डालकर जीटीबी हॉस्पिटल ले गए, लेकिन वहां उसका इलाज नहीं किया गया। बस नाम के लिए सिर पर पट्टी चिपका दी। मैं अस्पताल पहुंची, फिर थाने गई। रात के 9 बज गए। मैंने देखा कि बेटा नीचे पड़ा हुआ है। उसका बदन काला पड़ा हुआ था। हम पुलिस के आगे बहुत गिड़गिड़ाए, लेकिन उन लोगों ने बेटे के पास जाने नहीं दिया। रात 1 बजे हम घर लौट आए।’ किस्मतून कहती हैं- ‘अगले दिन रात 11 बजे पुलिस ने खबर भिजवाई कि लड़के को ले जाओ। मैंने बेटे की हालत देखी तो मेरी जान निकल गई। न वो चल पा रहा था, न ऑटो में बैठ पा रहा था। घर लाकर उसके कपड़े उतारने चाहे, तो दर्द के मारे उसके हाथ भी नहीं उठ रहे थे। कैंची से कपड़े काटने पड़े। सारे बदन पर डंडों के निशान थे। सुबह अस्पताल गए, वहां उसे कोई एडमिट नहीं कर रहा था। एक एनजीओ ने भर्ती करवाया। बिस्तर पर लिटाकर ग्लूकोज चढ़ाया। जैसे ही दूसरा बॉटल चढ़ाने चले, मेरे हाथों में उसने दम तोड़ दिया।’ फैजान की मौत का केस अब सीबीआई को सौंप दिया गया है। दिल्ली दंगों में आईबी के कर्मचारी अंकित शर्मा की भी हत्या हुई थी। अंकित शर्मा की लाश नाले में फेंक दी गई थी। उनके शरीर पर चोट के 51 जख्म थे। इस घटना के बाद अंकित के परिवार ने खजूरी का अपना मकान किराए पर दे दिया और अब दूसरी जगह रह रहे हैं। अंकित के भाई अंकुर शर्मा कहते हैं- ‘25 फरवरी, 2020 को भाई ड्यूटी से लौट रहा था। घर के पास ही दंगा हो रहा था और वो दंगे में फंस गया। दंगाइयों ने कहा कि ये पुलिस का कर्मचारी है, इसके बाद बुरी तरह से मारा। शाम तक जब भाई घर नहीं आया तो 8 बजे हम उसे ढूंढने निकले। हमने पुलिस की मदद ली। कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने छत से देखा कि दंगाइयों ने नाले में किसी की बॉडी डाली है। भाई की बॉडी वहीं से मिली। दिल्ली सरकार ने अंकित शर्मा के परिवार को 1 करोड़ रुपए मुआवजा और भाई अंकुर को शिक्षा विभाग में नौकरी दी है। हालांकि, केंद्रीय कर्मचारी होने के बाद भी केंद्र सरकार की तरफ से उन्हें कोई मदद नहीं मिली है। अंकित शर्मा की हत्या के आरोप में पूर्व पार्षद और आम आदमी पार्टी नेता ताहिर हुसैन की गिरफ्तारी हुई थी। ताहिर पर दंगों की साजिश और फंडिंग का भी आरोप है। ट्रम्प भारत आने वाले थे, इसलिए दंगाइयों ने वो तारीख चुनीं : पूर्व कमिश्नर, दिल्ली पुलिस दंगों के दौरान दिल्ली के पुलिस कमिश्नर रहे एस एन श्रीवास्तव बताते हैं- ‘कुछ मुस्लिम संस्थाओं ने दिसंबर, 2019 में जामिया नगर और ओखला के इलाकों में प्रदर्शन किया। इसमें उमर खालिद समेत कई लोगों का नाम आया। कुछ राजनीतिक दलों का भी इसमें हाथ था, लेकिन हमें उनके खिलाफ सबूत नहीं मिला। इन लोगों ने सरकार के खिलाफ कई जगहों पर आंदोलन किए। जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन और भड़काऊ भाषण दिए। दिल्ली में हुआ दंगा ट्रम्प के दौरे से जुड़ा हुआ है। अगर ट्रम्प भारत नहीं आते, तो हो सकता है कि वो दंगा वहां नहीं होता या इतने बड़े पैमाने पर नहीं होता। उनका यही मकसद था कि ट्रम्प के भारत दौरे के दौरान वो दिखाएं कि सरकार जो कर रही है, उससे लोग खुश नहीं हैं।’ एस एन श्रीवास्तव बताते हैं- ‘इन्वेस्टिगेशन के दौरान हमें एक वॉट्सएप ग्रुप के बारे में पता चला। उस ग्रुप में दस दिन पहले से ही दंगों की साजिश रची जा रही थी। ग्रुप में नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के कई एक्टिविस्ट्स और नेताओं की चैट थी। कुछ बड़े लोग भी ग्रुप में शामिल थे।’ हमारी जांच में ये भी पता चला कि दंगे से 2-4 दिन पहले इन्होंने अपने लोगों को गर्म तेल, गर्म पानी, डंडे, पत्थर जैसी चीजें तैयार रखने को कहा था। नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में मिक्स पॉपुलेशन है, वहां मुस्लिम और हिंदू दोनों हैं। इनको पता था कि दूसरी तरफ से भी विरोध होगा। जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के पास उन्होंने एक सड़क जाम कर दी थी। उसमें करीब 200-250 औरतें बैठ गई थीं। चांदबाग के इलाके में हमने ताहिर हुसैन का मनी ट्रेल देखा। उसने दंगा ऑर्गनाइज करने में काफी पैसा खर्च किया था। अपने घर पर उसने काफी सारे लोगों को इकट्ठा किया था। छतों पर पत्थर और एसिड जमाकर रखा था। उसके पास विस्फोटक पदार्थ थे, खासतौर पर एसिड बम।’ 758 एफआईआर, लेकिन अब तक 16 मामलों में ही दोष साबित हआ वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी के मुताबिक, दिल्ली दंगों में अब तक 2619 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें से 2094 लोग जमानत पर हैं। अदालत ने अब तक 47 लोगों को ही दोषी पाया है, जबकि 183 लोगों को बरी कर दिया है। अभी तक 16 मामलों में ही दोष साबित हुआ है। दिल्ली दंगों में पुलिस ने 758 केस रजिस्टर किए गए थे। इनमें 62 केस क्राइम ब्रांच और 695 केस उत्तर पूर्वी दिल्ली के विभिन्न थानों में दर्ज हैं, लेकिन दंगों की क्या वजह थी, ये जानने के लिए पुलिस ने एक अलग केस 59/2020 रजिस्टर किया था। इसी केस के तहत पुलिस ने कपिल मिश्रा से पूछताछ की थी, लेकिन पुलिस की एफआईआर में भी कपिल का नाम शामिल नहीं है। पुलिस ने ताहिर हुसैन, उमर खालिद, शरजील इमाम, खालिद सैफी, इशरत जहां, मीरान हैदर, गुलफिशा, शफा उर रहमान, आसिफ इकबाल तान्हा, शादाब अहमद, तसलीम अहमद, सलीम मलिक, मोहम्मद सलीम खान, अतहर खान, फैजान खान, नताशा नरवाल, सफूरा जरगर और देवांगन कलीता को यूएपीए समेत तमाम संगीन धाराओं में आरोपी बनाया है। इस केस में गुलफिशा इकलौती महिला हैं, जिन्हें अब तक बेल नहीं मिल पाई है और वो जेल में हैं। गुलफिशा के वकील हर्ष बोरा बताते हैं- ‘पुलिस के आरोप झूठे हैं। उनके पास कोई सबूत नहीं है, जिससे साफ हो पाए कि गुलफिशा दंगों में शामिल थी, लेकिन आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए में बेल मिलना मुश्किल है। जमानत के लिए तीसरी बेंच के सामने बहस हो रही है, दो बार आर्गुमेंट्स के बाद जजों का ट्रांसफर हो गया। तीसरी बार हमारी तरफ से आर्गुमेंट्स हो गई है। सरकार की तरफ से देरी हो रही है।’ कपिल मिश्रा बोले- ताहिर का चुनाव लड़ना हमारे जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा दिल्ली दंगों के आरोपी और पूर्व आप पार्षद ताहिर हुसैन को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रचार के लिए 6 दिन की सशर्त जमानत दी है। ताहिर एआईएमआईएम के टिकट पर मुस्तफाबाद से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। खुद असदुद्दीन ओवैसी भी लगातार ताहिर हुसैन के लिए सभाएं और रोड शो कर रहे हैं। मुस्तफाबाद के बगल की सीट करावल नगर से चुनाव लड़ रहे पूर्व विधायक और बीजेपी नेता कपिल मिश्रा कहते हैं- ‘जब आप ताहिर हुसैन जैसे व्यक्ति को चुनाव में उतारते हैं या उसे बचाने वाले मनोज त्यागी को आम आदमी पार्टी करावल नगर से टिकट देती है, तब दिल्ली दंगों की पीड़ा एकदम से ताजा करने की कोशिश की जाती है। हमारे घावों पर नमक छिड़कने की कोशिश की जाती है।’ कपिल मिश्रा कहते हैं- ‘किसके घर के ऊपर पेट्रोल बम मिला? ताहिर हुसैन की छत पर मिले थे न? यही दंगे की गुत्थी है। अचानक से 5 मिनट में उसने बम इकट्ठे कर लिए? यानी दंगों की तैयारी पहले से थी।’ दिल्ली दंगों के बाद 2022 में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन लोकुर, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एपी शाह, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आरएस सोढ़ी, पटना हाईकोर्ट की पूर्व जज जस्टिस अंजना प्रकाश और पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई ने एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की थी। रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस की जांच पर सख्त टिप्पणी की गई थी। इसके अलावा केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार और मीडिया-सोशल मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए थे। पटना हाईकोर्ट की पूर्व जज अंजना प्रकाश कहती हैं- ‘हमने तमाम एफआईआर और चार्जशीट की स्टडी की, ओपन कॉल देकर लोगों को अपनी बात रखने को कहा, कई लोगों ने आकर बयान दिए। सीएए के विरोध में बैठे लोगों को देशद्रोही बताया गया। सिर्फ एक समुदाय को टारगेट किया गया। केंद्र सरकार चाहती तो महज कुछ मिनटों में ही दिल्ली में दंगे रुक सकते थे।’ दिल्ली दंगों के बाद दिल्ली में पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इससे पहले हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 2014 और 2019 की तरह 2024 में भी सभी सातों सीटें जीत ली थीं। 2020 के दंगों का इस बार के चुनाव पर क्या असर होगा, इसको लेकर सीनियर जर्नलिस्ट आदेश रावल बताते हैं- 'दिल्ली दंगा अब पुराना मामला हो चुका है। ज्यादातर लोग इसे भूल चुके हैं। एक पार्टी इसे याद दिलाने की कोशिश कर रही है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसका कोई खास असर चुनावों में होगा। इस बार दिल्ली में हर दिन नए-नए मुद्दे बनते जा रहे हैं। बीजेपी और केजरीवाल दोनों नए मुद्दे उछाल रहे हैं।' ---------------------------------- ये भी पढ़ें : 1. निर्भया कांड से 20 दिन पहले बनी 'आप': मोदी ने दिल्ली को रेप कैपिटल कहा; फांसी के लिए रात ढाई बजे खुला सुप्रीम कोर्ट
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