ब्लैकबोर्ड- यहां 15 अगस्त को मनाते ‘काला दिवस’:हर घर में शहीद; फिर भी नहीं फहराया जाता तिरंगा

1 year ago 7
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मेरे गांव के हर घर में एक शहीद है। आज भी गांव का हर दसवां पुरुष सैनिक है। 160 साल पहले एक समय ऐसा भी आया था जब गांव में मात्र 100 लोग बचे थे। अंग्रेजों ने किसी को तोप के मुंह पर बांधा तो किसी के ऊपर रोड रोलर चला दिया। इतने सब के बाद एक दिन अंग्रेज हमारे घरों की महिलाओं को छूने आ रहे थे। फिर क्या था, घर की अधिकतर महिलाओं ने कुएं में कूदकर जान दे दी। 35 साल के प्रदीप कौशिक जिस कुएं की तरफ इशारा कर रहे हैं, उसका पानी अब हरा पड़ चुका है। ब्लैकबोर्ड की नई कहानी मुझे हरियाणा के भिवानी जिले के ‘रोहनात’ गांव लेकर आई है। जिला मुख्यालय से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर इस गांव को अंग्रेजों ने 'विद्रोहियों का गांव' नाम दिया था। आजादी की लड़ाई का सबसे पहला सशस्त्र विद्रोह याद कीजिए। दरअसल, 1857 के मई महीने से लेकर सितंबर महीने तक यह गांव अंग्रेजों की आंख की किरकिरी था। अंग्रेजों ने अपने सरकारी दस्तावेज में लिखा कि इस ‘रोहनात’ के तीन लड़कों ने पूरे गांव को हमारे खिलाफ भड़काया है, इसलिए उन्हें फांसी दी गई। इस घटना की असली कहानी स्थानीय लोग सुनाते हैं। उनके मुताबिक गुलाम भारत में गांव के लोगों ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया था। एक ही दिन में तीन जगह धावा बोला था। सुबह अंग्रेजी खजाना लूट लिया। दोपहर में 12 अंग्रेजी अफसरों को गोली मारी और उस दिन शाम को स्थानीय जेल तोड़कर अपने लोगों को रिहा करा दिया। इसी बात की सजा हमारा गांव आज तक भुगत रहा है। इतने स्वर्णिम इतिहास के बाद भी इस गांव में 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्टूबर जैसा दिन नहीं मनाया जाता, ऐसा क्यों? जवाब एक साथ मिला- ‘हां, हम स्वतत्रंता दिवस को काला दिवस कहते हैं। 2018 में तत्कालीन सीएम मनोहर लाल खट्टर इस गांव में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आए थे। तब भी हम लोगों ने उन्हें बगल के गांव में तिरंगा फहराने दिया। इससे ज्यादा हम आपको नहीं समझा सकते।’ मुझे अपने सवालों का जवाब नहीं मिला था। मुझे लगा गांव के एकमात्र स्कूल में 15 अगस्त की तैयारी न होने का कारण पता चलेगा। लेकिन इस बारे में अध्यापक बोलने को तैयार नहीं हुए। कुछ स्टाफ ने दबी जुबान में कहा कि ‘झंडा तो फहराया जाता है, लेकिन गांव का कोई नहीं आता है। बच्चे लड्डू की जिद करते हैं, तो हम लोग मिलजुल कर कभी-कभी चुपचाप से बांट देते हैं। खुलकर कुछ करने की इजाजत नहीं है। आपको पता है कुछ साल पहले तक 15 अगस्त को स्कूल में एक ब्रिगेडियर साहब आते थे, वह बच्चों को बताते थे कि क्यों गांव में झंडा नहीं फहराना है।’ खैर, स्कूल से बाहर निकलते ही मुझे नजदीकी कस्बे में कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाने वाले स्थानीय प्रदीप कौशिक मिले। वही प्रदीप जिनका जिक्र कहानी की शुरुआत में किया है। मैंने सीधे सवाल किया कि आप लोगों की मांग कुछ भी हो, तिरंगा न फहराने का क्या मतलब है? प्रदीप कहने लगे, 'देखिए सर, आप आए हैं दिल्ली से। आपको लग सकता है कि हम लोग झंडा न फहराकर कुछ गड़बड़ कर रहे हैं। हमारे पूर्वज और हम लोग तो सभी को हमेशा से ही खटकते रहे हैं। अंग्रेजों को भी हमारे पूर्वज देशद्रोही ही लगते थे। आज आपको भी हम गलत लग रहे हैं, इसमें नया कुछ नहीं। मैं बस आपसे यह कहना चाहता हूं कि देश को भूलना नहीं चाहिए कि हमारे गांव के पुरुषों के साथ-साथ हर एक घर की महिलाओं ने भी शहादत दी है। नोंगाराम जाट नाम के हमारे एक पूर्वज को अंग्रेजों ने बीच गांव में फांसी पर लटकाकर सबसे कहा था कि जो उतारेगा उसे भी टांग देंगे। इस तरह की दहशत के बीच हमारे पूर्वजों ने आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बावजूद एक समय हालात ये थे कि गांव ही नीलाम कर दिया गया। आज गांव के शहीदों को, उनकी अगली पीढ़ियों को उचित सम्मान नहीं मिल रहा, ऐसे में तिरंगा फहराना एक तरह से उनका अपमान ही है।’ प्रदीप से इजाजत लेकर मैं कैमरा चालू करता हूं। कैमरा ऑन होते ही वह और अधिक गुस्से में आ जाते हैं। कुछ देर ठहर कर हमें गांव का इतिहास समझाते हैं। ‘11 मई, 1857 को दिल्ली में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ था। उस समय हमारे गांव से 12 किलोमीटर दूर हांसी में अंग्रेजों का हेडक्वार्टर और जेल था। गांव के लोगों ने चुपके से आस-पड़ोस के लोगों को इकट्ठा किया और विद्रोह करने का प्लान बनाया। इसके लिए 29 मई, 1857 की तारीख तय हुई। सुबह-सुबह गांव वालों ने यहां से दस किलोमीटर दूर तोशाम नाम की जगह से सरकारी खजाना लूटा। दोपहर में अंग्रेजों के हेडक्वार्टर हांसी में जेल तोड़ दी और कैदियों को रिहा कराया। शाम को जिला मुख्यालय हिसार में 12 और हांसी में 11 अंग्रेज अफसरों को मार डाला। इसके बाद अंग्रेजों ने हमारे गांव को तहस-नहस कर दिया। इस घटना के बाद हमारा गांव रोहनात फेमस हो गया। यहां क्रांतिकारियों का डेरा जमने लगा। इससे गांव के लोगों में आत्मविश्वास बढ़ा। उन दिनों हांसी का अंग्रेज कलेक्टर था विलियम ख्वाजा। वह रोहनात गांव पर नजर बनाए हुए था। उसने घटना के तीन महीने बाद हांसी के तहसीलदार को 14 सितंबर 1857 को चिट्ठी लिखी और कहा कि यह गांव देशद्रोही हो गया है। इसलिए इसकी पूरी जमीन जब्त की जाएगी। इसके बाद 20 जुलाई, 1858 को अंग्रेज फाइनेंशियल कमिश्नर के ऑर्डर पर गांव की नीलामी हो गई। अंग्रेजों की नीति थी फूट डालो राज करो। इसी थ्योरी पर अंग्रेजों ने आस-पड़ोस के कुल छह गांव के 61 लोगों को हमारी जमीन बेच दी। हम लोग तब से बिना जमीन के हैं। गांव में लोगों के पास आज भी खेती के लिए जमीन नहीं है। आप खुद सोचिए देश को आजाद कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने भी गोली खाई है। उन्हें न तो सेनानी का दर्जा मिला और न ही उनके बाल-बच्चों को सम्मान जनक जीवन। ऐसे में किस आधार पर आप कहते हैं कि हम लोग देश के दूसरे लोगों की तरह आजाद हैं।’ प्रदीप से मिलने के बाद हमारी मुलाकात गांव में ही मिडिल स्कूल चलाने वाले राम प्रसाद कौशिक से हुई। राम प्रसाद शहीद भगत सिंह क्लब के अध्यक्ष भी हैं। 40 साल के राम प्रसाद के पास कुल 3 एकड़ की खेती है। राम प्रसाद बताते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि अंग्रेजों ने सिर्फ हमारा गांव नीलाम किया था। देश में जहां भी विरोध की आवाज आती थी वो यही करते थे। हमारे गांव में तो लोगों को डराने के लिए अंग्रेजों ने शहीद बिरड़ दास बैरागी को तोप पर बांध दिया। इसके बाद तोप का मुंह गांव की तरफ करके फायर कर दिया। इन सब अत्याचारों के बाद जब देश आजाद हुआ तो सभी जगहों पर अंग्रेजों वाली नीलामी वापस हो गई। हमारे लोगों ने भी प्रयास किया। इसके बाद हमारे गांव को 57 बीघा सरकारी जमीन भी अलॉट हुई, लेकिन अब लगता है कि हमारा गांव ही मनहूस है।’ मैंने रोहनात के ग्रामीणों द्वारा किए गए प्रयासों के बारे में जानने की कोशिश की। मुझे धर्मवीर फौजी मिले, जो साल 1973 से 2003 तक भारतीय नौसेना में फौजदार रहे हैं। वो कहते हैं, ‘आजादी के लगभग दस साल बाद 1966 में हमारे गांव को पंजाब सरकार (तब तक हरियाणा - पंजाब एक राज्य थे) ने आदर्श गांव घोषित कर दिया और तत्कालीन सीएम प्रताप सिंह कैरों ने 57 बीघा जमीन पड़ोस के बीड़ में अलॉट करने की घोषणा की। इस घोषणा के चार दिन के भीतर ही उनका निधन हो गया और फिर कोई सुनवाई नहीं हुई। आप सब ने फिर क्या प्रयास किया? मैं तीस साल तक देश की सेना में था। मुझे थोड़ा-थोड़ा एहसास होता है कि हमारे पूर्वजों पर क्या बीती होगी। सम्मान मांगने की चीज नहीं है। उसके लिए अगर मुंह खोलकर कहना ही पड़े तो फिर सम्मान किस बात का। धर्मवीर फौजी कहते हैं, ‘आज मेरे पास मात्र पांच एकड़ की खेती है। गांव-घर में कोई रिश्तेदार आते हैं तो हम उन्हें यह भी नहीं दिखा सकते हैं कि हमारे खेत कहां हैं। मैंने गांव में ही कुछ जमीन खरीदी है। सोचकर ही बुरा लगता है कि अपनी ही जमीन को मुझे दोबारा पैसे देकर खरीदना पड़ा है।' ग्रामीणों से बातचीत में पता चला कि साल 1970 में यहां के सरपंच बृजलाल शर्मा ने हरियाणा के तत्कालीन सीएम बंसीलाल और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की थी। उस दौरान क्या बातचीत हुई थी, ये जानने के लिए मैं बृजलाल शर्मा के बेटे ध्रुव शर्मा से मिलने पहुंचता हूं। ध्रुव बताते हैं, ‘मेरे पिता बांग्लादेश की लड़ाई के कुछ महीने पहले ही इंदिरा गांधी से मिलने गए। इंदिरा जी ने सीएम बंसीलाल से मदद करने को कहा। पिताजी ने तब एक एस्टिमेट बनाया था, जिससे पता चला कि कुल जमीन की कीमत 64 लाख रुपए हो रही थी, जो गांव वालों को दिया जा सकता था। लेकिन तब हरियाणा-पंजाब हाल ही में अलग हुए थे तो खजाने में पैसा नहीं था। फिर भी बंसीलाल ने 1972 में गांव के 25 लोगों को चुनकर सवा लाख रुपए दिए। यहां कॉलोनी बनवाई और कॉलोनी के बीच में एक पार्क भी बनवाया। उसमें पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू जी की मूर्ति भी लगाई गई, लेकिन आज तक उस मूर्ति का उद्घाटन नहीं हो सका मैंने वर्तमान सरपंच प्रतिनिधि हंसराज से जमीनी हालात जानने चाहे। हंसराज कहते हैं,‘ हमारे गांव में दर्जनों लोग आजाद हिंद फौज के सिपाही रहे हैं। कई पुराने घरों में आपको छज्जे और दीवारों पर भारत माता की फोटो उकेरी हुई मिल जाएगी। कई घरों के रोशनदान में ‘जय हिंद’ लिखा हुआ मिल जाएगा। आजादी के सत्तर साल बाद तक हमने कई धरोहर बचाकर रखी है, लेकिन इसके बावजूद किसी को हमारी चिंता नहीं है। मेरे गांव रोहनात के अधिकार क्षेत्र में कागज पर मात्र 13 बीघा जमीन आती है। मैं लोगों को चाहकर भी पट्टा नहीं कर सकता हूं। किसी की मदद करने की इच्छा रखकर भी मदद नहीं होती है।’ इस बार झंडा फहराएंगे? ‘देखिए, चाहे कुछ भी हो जाए। जब तक हमें हमारी जमीनें या उसके एवज में मुआवजा नहीं मिलेगा, हम लोग रोहनात के नाम से कागज में दर्ज 12 बीघे में झंडा नहीं फहराएंगे। आजादी की लड़ाई में शहीद हुए लोगों को उचित सम्मान की लड़ाई तीसरी पीढ़ी में जमीन की हो चली है। मामला सम्मान और पेट दोनों से जुड़ा है। जाते-जाते मुझसे एक बात राम प्रसाद कौशिक कह गए- सर, सब बात ठीक है, पर सम्मान से पेट तो नहीं भरता है न। जमीन रहेगी तो ही तो दो पैसा कमा भी सकेंगे।
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