भारत–पाक बॉर्डर पर निगरानी आधी हुई:जहां 30 जवान थे, अब आधे भी नहीं; बॉर्डर की आंखों देखी

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भारत-पाक बॉर्डर पर जवानों की संख्या आधी रह गई है। जिन बॉर्डर आउट पोस्ट, यानी BOP पर 30 से 40 जवान पहरेदारी करते थे, वो अभी 10 से 12 पर पहुंच गया हैं। पेट्रोलिंग की फ्रीक्वेंसी भी पहले से आधी रह गई है। जवान कम होने से निगरानी का इलाका बढ़ गया है। पहले जहां दो जवान 500 से 600 मीटर का एरिया देखते थे, वो अब डेढ़ से दो किमी हो गया है। इससे घुसपैठ का खतरा बढ़ गया है। मैं भारत-पाक बॉर्डर के राजस्थान से साझा होने वाले हिस्से में हूं। शाम के 4 बजे हैं। यहां आकर पता चला कि BSF की 375 कंपनियां बिहार चुनाव में भेजी गई हैं। बॉर्डर पर जवानों की संख्या कम होने की बड़ी वजह यही है। अक्टूबर के पहले हफ्ते से जवानों का मोबलाइजेशन शुरू हुआ था। वापसी नवंबर के तीसरे हफ्ते तक होगी। जहां 500 जवान होते थे, वहां से 360 हट गए BSF की स्ट्रेंथ को ऐसे समझिए-कुल जवान- 2.65 लाख, ये जवान 193 बटालियन में बंटे हैं। एक बटालियन में 7 कंपनियां होती हैं। इस तरह BSF में करीब 1351 कंपनियां हुईं। हर 7 में से 1 कंपनी मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स, यानी MHA, यानी गृह मंत्रालय के लिए रिजर्व होती है। ऐसे में हर बटालियन से 6 कंपनियों पर ही बॉर्डर संभालने की जिम्मेदारी होती है। इन्हीं में से 375 कंपनियों को चुनावी ड्यूटी के लिए भेजा गया है। एक कंपनी 2 से 3 BOP संभालती है। इसी तरह 6 कंपनियां 16 से 18 BOP संभालती हैं। एक कंपनी में एवरेज 80 का मैदानी मैनपावर होता है, यानी 6 कंपनियों में 500 का मैनपावर हुआ। 6 में से कहीं से 3 तो कहीं से 4 कंपनियां हटाई गई हैं। यानी 500 में से 360 के आसपास जवान हट गए हैं। क्योंकि ये भी नियम है कि जब कोई कंपनी बाहर मोबलाइज करेगी तो कम से कम उसमें 90 जवान होना ही चाहिए। इसे और बारीकी से समझते हैं। BSF की एक बटालियन में औसत 1100 का मैनपावर है। 25 फीसदी छुट्‌टी वालो जवानों को हटा दें तो 825 मैनपावर बचा। इसमें 360 इलेक्शन वाले हटा दें तो 465 जवान बचे। करीब 10 फीसदी बीमारी वाले निकल जाएंगे, ऐसे करीब 400 जवान बचे। इनमें 50 से 60 अटैचमेंट पर होते हैं, कुछ दिल्ली में, कुछ कमांड, सेक्टर या फ्रंटियर में अटैच हैं। इसके बाद करीब 350 जवान बचे। अब इन 350 जवानों को बॉर्डर और बटालियन का हेडक्वार्टर दोनों चलाना है। इसमें 50 से 60 ड्राइवर होंगे। 35 से 40 क्लेरिकल स्टाफ, कम्युनिकेशन सिग्नल वाले, कैमल हैंडलर, सीएमएचओ, कुक हैं। इन सबको हटा दें तो बॉर्डर के लिए करीब 200 जवान बचेंगे। अब इन 200 जवानों को 16 से 18 BOP संभालना है। यानी BOP पर एवरेज 10 से 12 जवान रह गए। ये भी दो शिफ्ट में काम करेंगे। यानी एक शिफ्ट में हर दो से तीन BOP पर 6 से 8 जवान ही सुरक्षा के लिए बचे। एक कंपनी में 140 जवान होना चाहिए। लेकिन छुटि्टयों, ट्रेनिंग कोर्स, टेंपरेरी ड्यूटी, मेडिकल लीव को हटा दें तो एक बार में 80 से 90 जवान ही मैदान में होते हैं। 375 कंपनियों के बिहार जाने का मतलब है कि, BSF की 193 बटालियन में से करीब 53 बटालियन चुनावी ड्यूटी में लगी हैं। यानी बॉर्डर की सुरक्षा में लगे करीब 34 हजार जवान इलेक्शन में ड्यूटी कर रहे हैं। नक्सल और कश्मीर से जवान नहीं हटाए जा सकते कुछ जगहों से जवानों को नहीं हटाया जाता। जैसे, एंटी नक्सल ऑपरेशन यानी NO। इसमें दो फ्रंटियर हैं, करीब 16 बटालियन हैं, 112 कंपनी हैं, इन्हें हटाया नहीं जाता। इसी तरह कश्मीर में BSF की करीब 15 बटालियन हैं, जो भारतीय सेना के साथ मिलकर काम करती हैं, यहां से भी जवान हटाए नहीं जाते। करीब 3 बटालियन दिल्ली में हैं, जो VVIP की सुरक्षा और दूसरे कामों के लिए नियुक्त हैं, इन्हें भी नहीं हटाया जाता। इन सबको मिला लें तो करीब 35 बटालियन ऐसी हैं, जिनका मैनपावर कहीं नहीं जाता। इसके अलावा ट्रेनिंग सेंटर, सेक्टर, फ्रंटियर, आईजी, डीआईजी हेडक्वार्टर वाला मैनपावर भी नहीं हटाया जाता। BSF के एक अफसर कहते हैं, ‘जवान सिर्फ बॉर्डर वाले हटाए जाते हैं।’ 25 फीसदी जवान छुट्‌टी पर होते हैं। नियम है कि, कम से कम 25 फीसदी जवान छुट्‌टी पर रहना चाहिए ताकि सभी को छुटि्टयां मिल सकें। एक जवान को एक साल में ढाई से तीन महीने की छुट्‌टी दी जाती है। कुछ डिफिशिएंसी चल रही है, यानी जितने पद खाली हुए, उसके अगेंस्ट में अभी भर्ती नहीं हुई है, या चल रही है। करीब 10 फीसदी जवान मेडिकल लीव पर होते हैं। बिहार इलेक्शन में BSF का करीब 30 फीसदी मैनपावर लगा है। 15 से 20 फीसदी मैनपावर अलग–अलग ड्यूटीज में कमिटेड है। 25 फीसदी जवान छुटि्टयों पर होते हैं। करीब 10 फीसदी लो मेडिकल कैटेगरी यानी MLC वाले होते हैं। यानी बॉर्डर की सिक्योरिटी के लिए अभी 25 से 30 फीसदी मैनपावर ही है। अब चलिए बॉर्डर पर… शाम के 5 बज रहे हैं। बॉर्डर आउट पोस्ट यानी BOP से जवान बॉर्डर पर जाने की तैयारी कर रहे हैं। बॉर्डर पर जाने से पहले जवान कम से कम आधा घंटे BOP में साफ–सफाई और दूसरे मेंटेनेन्स से जुड़े काम करते हैं। बॉर्डर पर पहुंचने के बाद गश्त शुरू हो जाती है। कुछ जवान पैदल गश्त कर रहे हैं। कुछ व्हीकल पेट्रोलिंग कर रहे हैं तो कोई ऊंट पर भी सवार है। वॉच टॉवर के ऊपर एक जवान खड़ा है। हाथ में दूरबीन है, जो आंखों से सटा हुआ है। रात हो चुकी है, इसलिए बड़े–बड़े पोल्स पर लगे फ्लड लाइट्स ऑन हो चुके हैं। इनका मुंह पाकिस्तान की तरफ है, ताकि वहां से कोई भी मूवमेंट हो तो साफ नजर आ सके। एक जवान ने कहा कि, ‘हमने तो फेंसिंग लगाई है, लाइट्स भी हैं, लेकिन पाकिस्तान ने कुछ इंतजाम नहीं किया। फेंसिंग तक नहीं लगाई। उनके जवान पहरा भी नहीं देते क्योंकि उन्हें पता है कि, भारत से तो कोई घुसपैठ होना नहीं है। वो बेफिक्र हैं, और हमारी निगाहें 24 घंटे उन पर टिकी रहती हैं।’ हर रोज फुटप्रिंट्स की जांच की जाती है एक अफसर कहते हैं, ‘बॉर्डर पर हम रोजाना पैरों के निशान यानी फुटप्रिंट्स और अन्य रिकॉर्ड्स की जांच करते हैं इससे पता चलता है कि उस पार से कोई इंसान या जानवर हमारे एरिया में तो नहीं आया। रात में तारों में करंट भी छोड़ते हैं।’ खैर, जो जवान अभी गश्त कर रहे हैं, वे रात 12 बजे तक बॉर्डर रहेंगे। फिर दूसरी शिफ्ट वाले जवान आएंगे जो सुबह 6 बजे तक रहेंगे, और उनके जान के बाद यही जवान फिर बॉर्डर पर आ जाएंगे। इसी तरीके से 24 घंटे निगरानी चलती रहती है। BSF में एक जवान को एक दिन में 2 शिफ्ट करनी होती है। यदि सुबह 6 बजे वाली शिफ्ट में कोई जवान जाता है तो उसकी शिफ्ट दोपहर 12 बजे खत्म होती है। कैंप में आते-आते 12.30 बज जाते हैं। फिर जवान नहाने, कपड़े साफ करने, कैंप मेंटेनेन्स करने जैसे छोटे-मोटे काम करते हैं। इसके बाद लंच करते हैं और सोते-सोते 2.30 बज जाते हैं। शाम को 6 बजे से फिर दूसरी शिफ्ट पर जाना होता है इसलिए 5 बजे तक उठ जाते हैं और तैयार होकर बॉर्डर पर चले जाते हैं। फिर रात में 12 बजे शिफ्ट ओवर होती है। आते-आते 12.30 बज जाते हैं। रात में फिर एक-डेढ़ घंटा डेली रूटीन एक्टिविटी में लगता है। इस तरह सोना 2 बजे तक हो पाता है और सुबह 5 बजे फिर उठना पड़ता है। ऐसे में जवानों की दोनों शिफ्ट में मिलने वाले गैप को मिलाकर भी 6 घंटे की नींद बमुश्किल हो पाती है। भारत–पाक बॉर्डर पर निगरानी होती कैसे है 3323 किमी लंबी भारत–पाक बॉर्डर की सुरक्षा की मुख्य जिम्मेदारी बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स यानी BSF की है। मोटेतौर पर BSF चार तरीकों ह्युमन सिक्योरिटी यानी हथियार लैस जवान, फिजिकल बैरियर्स जैसे कंटीले तारों की बाड़, टेक्नोलॉजिकल सर्विलांस जैसे सेंसर, कैमरा, ड्रोन और इंटेलीजेंस कोर्डिनेशन जैसे, एजेंसी के बीच शेयरिंग से बॉर्डर की सुरक्षा करता है। इनमें सबसे अहम हथियार लैस जवानों की गश्त होती है। जवान 24 घंटे बॉर्डर पर पहरा देते हैं। यही घुसपैठ रोकते हैं। यही तस्करी रोकते हैं। यही बॉर्डर के पास होने वाले क्राइम को रोकते हैं। BSF में 6 से 12 और 12 से 6 की शिफ्ट लगती है। यानी जवानों को सुबह 6 से दोपहर के 12 बजे तक, दोपहर 12 से शाम के 6 बजे तक, शाम 6 से रात 12 बजे तक और रात 12 से सुबह 6 बजे तक बॉर्डर पर ड्यूटी करनी होती है। एक जवान की एक दिन में दो शिफ्ट लगती हैं। शिफ्ट के दौरान जवान एक BOP से दूसरी BOP के बीच पहरेदारी करते हैं। कहीं यह दूरी 2 से 3 किमी होती है। कहीं 3 से 5 किमी तक होती है। संवेदनशील इलाकों में दूरी कम है, जहां रिस्क ज्यादा नहीं है, वहां दूरी ज्यादा है। जवान कम होने से निगरानी का एरिया दोगुना होता है BSF के रिटायर्ड एडिशनल डीजी एसके सूद कहते हैं, ‘BSF के जवान मणिपुर, कश्मीर और माओवादी इलाकों में भी तैनात हैं, जहां से उन्हें हटाया नहीं जा सकता।’ ‘ऐसे में चुनाव के लिए बची हुई कंपनियों में से ही कुछ को भेजा जाता है। इससे सिक्योरिटी कमजोर होती है। क्योंकि लंबे समय के लिए जवान सीमा से दूर हो जाते हैं। वहीं जो मौजूदा जवान होते हैं, उन पर एक्स्ट्रा बर्डन आता है। जवान पहले ही 12 से 14 घंटे की ड्यूटी कर रहे हैं।’ सूद के मुताबिक, ‘जवान कम होने से जो जवान पहले 10 किमी को देख रहा होगा, अब उसे 20 किमी का एरिया कवर करना होगा। ऐसे में जवान का फिजिकल, मेंटल स्ट्रेस तो बढ़ेगा ही साथ ही निगरानी कमजोर होना लाजिमी है, क्योंकि गश्त की फ्रिक्वेंसी कम होगी।’ वे कहते हैं, ‘1999 के बाद करगिल रिव्यू कमेटी ने कहा था वन फोर्स एक टास्क। यानी जो जवान बॉर्डर पर ड्यूटी कर रहे हैं, वो वही करेंगे। जो अंदरूनी काम में है, वो वहीं देखेंगे। लेकिन कमेटी की सिफारिशें आज तक लागू नहीं हो पाईं।’ कुछ कंपनियां भी कम हो जाएं तो पूरे एरिया पर असर BSF के रिटायर्ड आईजी बीएन शर्मा कहते हैं, ‘बॉर्डर से कुछ कंपनियों को भी निकाला जाए तो उसका असर पूरे एरिया में पड़ता है। बॉर्डर से मिनिमम रिक्वायरमेंट किसी भी हाल में कम नहीं होना चाहिए।’ ‘इलेक्शन में जहां हाइपर सेंसेटिव एरिया हैं, वहां जवानों को भेजा जा सकता है, लेकिन हर जगह ही BSF को लगा दिया जाएगा तो बॉर्डर कौन संभालेगा। BSF की पहली ड्यूटी सीमा सुरक्षा है।’ जून में एक पाकिस्तानी युवक–युवती अंदर घुस आए थे इसी साल जून में राजस्थान के जैसलमेर में एक पाकिस्तानी युवक–युवती बॉर्डर क्रॉस कर भारत में घुस आए थे। भेड़–बकरी पालने वालों ने इनकी लाश देखकर तनोट पुलिस को सूचना दी थी। दोनों भारतीय सीमा में करीब 15 किमी अंदर तक घुस आए थे। दोनों के पास से पाकिस्तानी पहचान पत्र मिले। बाद में पता चला कि, प्यास और डिहाइड्रेशन के चलते दोनों की मौत हुई। इस घटना के बाद बॉर्डर की सुरक्षा पर सवाल खड़े हुए थे। हम उन गांव वालों से मिले, जिन्होंने दोनों पाकिस्तानियों की लाश देखकर पुलिस को सूचना दी थी। भेड़–बकरी पालने वाले पर्वत सिंह ने बताया कि, हम बॉर्डर के नजदीक तक भेड़ें लेकर जाते हैं। हमारे ही एक साथी ने दोनों लाशें देखी थीं। पर्वत सिंह कहते हैं, बाद में पुलिस–BSF सब ने हमसे पूछताछ की। लेकिन वे अंदर कैसे आए ये किसी को पता नहीं चला। बॉर्डर के नीचे से सुरंग करके आए होंगे या ऊपर कई बार रेत आ जाती है, उसे पार करके आए होंगे। इसी गांव में रहने वाले भगवानदास कहते हैं, जब बाड़ नहीं लगी थी तब पाकिस्तानी हथियार लेकर गांव में घुस जाते थे और हमारे मवेशी ले जाते थे। वे कई लोग एकसाथ आते थे, लेकिन जब से बाड़ लगी है, तब से कम से कम जैसलमेर में तो घुसपैठ नहीं होती। कई सालों बाद पाकिस्तानी युवक–युवती कैसे घुस आए ये पता नहीं। BSF में 10 हजार वैकेंसी : पिछले साल गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि, BSF में 10 हजार 145 वैकेंसी हैं। वहीं पिछले 5 साल में 7372 नई पोस्ट क्रिएट की गई हैं। उन्होंने जानकारी दी थी कि, बीते 5 सालों में 54 हजार 760 पर्सनेल BSF में रिक्रूट किए गए हैं। हमने इस मामले में मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स के बॉर्डर मैनेजमेंट डिवीजन में सेक्रेटरी डॉ राजेंद्र कुमार से बात करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं हो पाई। हमने उन्हें सवाल आधिकारिक वेबसाइट पर ईमेल किए हैं। मिनिस्ट्री से जैसे ही रिप्लाई आएगा, खबर में अपडेट किया जाएगा। नोट : सुरक्षा के नजरिए से इस खबर में लोकेशन, BOP के नाम, जवानों के चेहरे उजागर नहीं किए जा रहे। ................................................. आप ये इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट भी पढ़ सकते हैं विदेशी लड़कियों को हाथ–पैर बांध, पीटकर बना रहे सेक्स वर्कर:बॉस के चंगुल में फंसाते हैं; उज्बेक, तुर्कमेनिस्तान की लड़कियां टारगेट पर ‘मैं उज्बेकिस्तान की रहने वाली हूं। नौकरी की तलाश में थी। इंस्टाग्राम पर एक लड़की से दोस्ती हुई। उसने दुबई आने को कहा। बोली– एक गर्भवती महिला है, उसके बच्चे को संभालने का काम है।’ ‘मैं उस पर यकीन कर दुबई पहुंची। फिर कहा गया कि, आपको किसी दूसरे शहर में रहना होगा। यह बोलकर मुझे नेपाल ले गए। फिर एक आदमी नेपाल से भारत ले आया।’ पूरी खबर पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें...।
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