लोकसभा चुनाव के आखिरी फेज की वोटिंग से ठीक पहले शुक्रवार को यूपी और बिहार में हीटवेव से करीब 40 लोगों की मौत हो गई। इनमें 25 लोग ऐसे थे, जो आखिरी फेज की वोटिंग ड्यूटी में तैनात थे। 40 दिनों से जारी इलेक्शन प्रोसेस 4 जून को मतगणना के साथ पूरी होगी। ये भारत के इतिहास का दूसरा सबसे ज्यादा दिनों तक चलने वाला चुनाव है। इससे पहले सिर्फ एक बार 1951-52 में 120 दिनों तक चुनाव चले थे। यह देश का पहला आम चुनाव था। हालांकि इसके बाद धीरे-धीरे इलेक्शन प्रोसेस छोटा होता चला गया। 1980 का लोकसभा चुनाव सिर्फ 4 दिनों में खत्म हो गया। सवाल उठता है कि 44 साल पहले जब बैलेट पेपर से वोटिंग होती थी, तो 4 दिन में चुनाव हो जाते थे; अब EVM से होते हैं फिर भी 44 दिन क्यों लगे? भास्कर एक्सप्लेनर में इलेक्शन प्रोसेस की पूरी कहानी... 20 अगस्त 1979 की बात है। केंद्र में जनता दल (सेक्युलर) के चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी थी। इस सरकार को इंदिरा गांधी की कांग्रेस का भी समर्थन प्राप्त था। 20 अगस्त को इंदिरा गांधी ने चरण सिंह सरकार से समर्थन वापस से लिया। इसकी वजह से प्रधानमंत्री बनने के मात्र 23 दिनों के भीतर ही चरण सिंह को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव के निर्देश दे दिए। जनवरी 1980 में सिर्फ दो तारीख 3 जनवरी और 6 जनवरी को देशभर में 7वीं लोकसभा चुनाव का आयोजन हुआ। महज 4 दिनों तक चली चुनावी प्रक्रिया के बाद 9 जनवरी को मतगणना हुई और 350 से ज्यादा सीटें जीतकर इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई। यह भारत के इतिहास का सबसे कम दिनों में खत्म होने वाला लोकसभा चुनाव था। हालांकि इसके बाद लगातार इलेक्शन प्रोसेस लंबी होती चली गई। इस बीच 2004 आम चुनाव में बैलेट पेपर की जगह EVM इस्तेमाल होने लगा। ऐसा लगा कि अब चुनावी प्रक्रिया कम दिनों में खत्म हो जाएगी, लेकिन बावजूद इसके चुनाव में लगने वाले समय में कमी नहीं आई। भारत में चुनावी प्रक्रिया लंबी होने के 4 मुख्य कारण नजर आते हैं… 1. वोटर्स की भारी संख्या 2. जियोग्राफिकल चुनौतियां 3. इलेक्शन मशीनरी और सिक्योरिटी पर्सनल का ट्रांसपोर्टेशन 4. परीक्षाओं, शादियों और त्योहार का असर लंबे इलेक्शन प्रोसेस से आम जनता को क्या नुकसान है पूर्व चुनाव आयुक्त सुनील त्रिवेदी के मुताबिक आचार संहिता से कई मायनों में आम लोगों पर असर पड़ता है, लेकिन सरकार को कुछ जरूरी चीजों पर निर्णय लेने की ढील दी जाती है। आचार संहिता के नाम पर सरकारी कार्यालय और कर्मचारी अपने काम-काज को टालने का काम करते हैं। चूंकि इलेक्शन कमीशन का कोई खुद का स्टाफ नहीं होता है। ऐसे में उसे बैंककर्मी, शिक्षकों आदि पर डिपेंड रहना होता है। जब चुनाव चल रहे होते हैं तो बैंकों और स्कूलों समेत कई अन्य संस्थानों की कार्य स्थिति पर प्रभाव पड़ता है जो आम लोगों को प्रभावित करता है। पॉलिटिकल एक्सपर्ट अमिताभ तिवारी बताते हैं कि आचार संहिता के दौरान कैश ट्रांसफर या डीबीटी स्कीम बंद कर दी जाती हैं। इससे आम लोगों को सरकार की तरफ से मिलने वाली सहायता प्रभावित होती है। अमिताभ आगे कहते हैं कि चुनाव में जितना ज्यादा समय लगेगा, धन का खर्च भी उसी तरीके से बढ़ेगा और चुनाव प्रक्रिया का खर्च भी उसी तरीके से बढ़ता जाता है। ये पैसा कर के माध्यम से जनता से वसूला जाता है तो जनता पर इसका अप्रत्यक्ष तौर पर प्रभाव पड़ता है। मौजूदा लोकसभा चुनावों के लंबे प्रोसेस को देखते हुए विपक्ष ने आरोप लगाया था कि लंबे चुनाव प्रचार से सत्ताधारी दल को फायदा होगा। वहीं राजनीतिक जानकार भी इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि कई चरणों में होने वाला चुनाव सत्तापक्ष को बढ़त दिलाता है। पॉलिटिकल एक्सपर्ट संजय कुमार कहते हैं कि यह सरकारी सिस्टम और आम लोगों के साथ-साथ बिजनेस और इकोनॉमिक ग्रोथ पर भी असर डालता है। लंबे प्रोसेस से बाजार अस्थिरता के दौर से गुजरता है जिससे वह कभी तेजी से ऊपर जाता है तो कभी तेजी से नीचे, जो बिजनेस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर प्रभाव डालता है। पूर्व डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर सीएस बंसल का मानना है कि सिक्योरिटी पर्सनल के मैनेजमेंट और ट्रांसपोर्टेशन में सरकारी पैसे खर्च होते हैं, इन कंपनीज को जितनी बार भी मूव किया जाएगा, उनका खर्चा भी उसी लिहाज से बढ़ता जाता है। जो अप्रत्यक्ष तौर पर आम लोगों की जेब पर मार करता है। मतगणना के इंतजार में रखी गईं ईवीएम मशीनों के रखरखाव का पैसा भी सरकारी खजाने से ही जाता है। लेखक और राजनीतिक जानकार रशीद किदवई का मानना है कि संचार, रक्षा, विदेश ये कुछ ऐसे मंत्रालय होते हैं जिनमें चौबीसों घंटे और सालभर काम किया जाता है, लेकिन इलेक्शन के दौरान ये मंत्रालय मूल रूप से प्रशासनिक अधिकारियों पर निर्भर रहते हैं, ऐसे में नीतियों पर प्रभाव पड़ता है। ऐसे में भारत में भी चुनावों के लिए केयरटेकर प्रधानमंत्री जैसी व्यवस्था का प्रावधान किया जा सकता है। इसके अलावा भी आचार संहिता के दौरान चुनाव में उपयोग किए जाने वाले काले धन के प्रवाह को रोकने के लिए प्रशासन काम करता है। जिसमें कई बार आम लोगों, व्यापारियों और किसानों, जो नकदी लेकर यात्रा कर रहे होते हैं, उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ जाता है। वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक पार्टियों पर जब काले धन जैसी कार्रवाई की जाती है, तब इन पर कार्रवाई का भी स्पष्ट स्वरूप देखने को नहीं मिलता। इसके अलावा एकेडमिक कैलेंडर भी चुनाव से प्रभावित होते हैं, जैसे इस चुनाव के दौरान यूपीएससी के एग्जाम की तारीखें एक महीने आगे बढ़ा दी गईं। लंबे प्रोसेस से फेक न्यूज और अफवाहों का खतरा भी बढ़ने का डर बना रहता है। साथ ही लंबे समय तक चुनावी मोड में रहने से जनता का लोकतंत्र में अविश्वास का खतरा भी बढ़ जाता है। दुनिया के अन्य देशों में चुनाव कैसे होते हैं? 16 करोड़ वोटर्स के साथ अमेरिका भारत के बाद दूसरा सबसे बड़ा लोकतंत्र है। भारत के मुकाबले अमेरिका की मतदान प्रक्रिया काफी लचीली है। अमेरिकी नागरिक मतदान के दिन पोलिंग बूथ जाकर मतदान के अलावा मेल के माध्यम से मतदान कर सकते हैं। वहीं नियत तारीख से पहले भी मतदान करने की सुविधा नागरिकों को दी जाती है। वहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान में असेंबली और प्रांतीय चुनाव एक साथ होते हैं। चुनाव से पहले पीएम को इस्तीफा देना होता है। केयरटेकर पीएम का चुनाव होता है जिस पर निष्पक्ष चुनाव की जिम्मेदारी होती है। पाकिस्तान में बैलेट पेपर के जरिए वोट दिया जाता है और मतदान के दिन ही मतगणना होती है। भारत के एक अन्य पड़ोसी देश बांग्लादेश की मतदान प्रक्रिया लगभग पाकिस्तान के जैसी ही है, यहां भी बैलेट पेपर से चुनाव कराया जाता है और वोटिंग के बाद से ही मतगणना शुरू हो जाती है और अगले दिन इसके रिजल्ट आ जाते हैं। इसी तरह इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी एक दिन में ही मतदान को पूरा करके उसी दिन मतगणना कर ली जाती है। साउथ अफ्रीका में इन दिनों भारत की तरह आम चुनाव हो रहे हैं। यहां बैलेट पेपर से चुनाव होते हैं। मतदाताओं को तीन बैलेट पेपर दिए जाते हैं। पहले में वे नेशनल इलेक्शन के लिए वोट डालते हैं। दूसरे में प्रांतों से नेशनल प्रतिनिधि चुनने के लिए वोट डालते है वहीं तीसरे में प्रांतों के लिए उम्मीदवारों का चुनाव किया जाता है। साउथ अफ्रीका में 29 मई को एक ही दिन में मतदान करवा लिया जाएगा जिसके नतीजे 2 जून को जारी कर दिए जाएंगे। अब सवाल ये उठता है कि जब कई देशों में बिना ईवीएम के बैलेट पेपर से चुनाव एक दिन में निपटाया जा सकता है तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। भारत के मतदाताओं की संख्या यूरोपियन यूनियन के 27 देशों की जनसंख्या से भी ज्यादा है। इतनी बड़ी जनसंख्या के साथ निष्पक्ष चुनाव कराना कठिन काम है जिसके चलते हमारी इलेक्शन प्रोसेस लंबी होती है। पाकिस्तान जल्दी चुनाव कर जरूर लेता है, लेकिन चुनावों की निष्पक्षता पर हर बार सवाल उठाए जाते हैं। क्या इलेक्शन प्रोसेस छोटा किया जा सकता है? चुनावी प्रक्रिया छोटा करने के बारे में जब हमने अपने एक्सपर्ट पैनल से पूछा तो उनका कहना था कि पर्याप्त सुरक्षा बलों के लिए सरकारों को भर्ती प्रक्रिया पर ध्यान देना होगा। साथ ही देश के दुर्गम इलाकों तक आवागमन और रोड कनेक्टिविटी दुरुस्त करनी होगी, जिससे मतदानकर्मियों के दल और सुरक्षाकर्मी आसानी से रिमोट लोकेशंस तक ट्रेवल कर सकें। इसके अलावा ऑनलाइन वोटिंग जैसे उपायों को अपनाने से भी इलेक्शन के लंबे प्रोसेस को छोटा किया जा सकता है, लेकिन इसे प्रयोग में लाने से पहले मजबूत सुरक्षा और निगरानी तंत्र बनाना जरूरी है। कुछ एक्सपर्ट वन नेशन वन इलेक्शन पर भी जोर देते हैं जिससे समय के साथ-साथ खर्च में भी कमी आ सकती है। वहीं वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने और मौसम की मार से बचने के लिए यूरोपीय देशों की तरह नाइट वोटिंग के ऑप्शन पर भी विचार किया जा सकता है।