मुंबई, नवी मुंबई, पुणे, नागपुर, ठाणे, पिंपरी चिंचवाड और नासिक, महाराष्ट्र के ज्यादातर बड़े नगर निगम अब BJP के हैं। नगर निगम चुनाव में BJP एकतरफा जीती, लेकिन रिजल्ट के और भी मायने हैं। मराठी मानुस की राजनीति करने वाले उद्धव और राज ठाकरे मुंबई तक सिमट गए। एकनाथ शिंदे सिर्फ ठाणे जीत पाए। BJP का साथ छोड़ चाचा शरद पवार के साथ चुनाव लड़े अजित पवार सबसे बड़े लूजर बन गए। कांग्रेस लातूर और चंद्रपुर के अलावा हर जगह हार गई। अब सिर्फ BJP पूरे महाराष्ट्र की पार्टी है। रिजल्ट बताता है कि शिवसेना और NCP में टूट के बाद बंटे वोट अब BJP की तरफ शिफ्ट हो चुके हैं। ऐसा कैसे हुआ, नगर निगम चुनाव के रिजल्ट के मायने क्या हैं, ये समझने के लिए हमने BJP नेताओं के अलावा महाराष्ट्र की राजनीति को समझने वाले एक्सपर्ट्स से बात की। पहला सवाल: BJP को इतनी बड़ी जीत कैसे मिली?
इसका जवाब महाराष्ट्र BJP के एक सीनियर लीडर देते हैं। वे कहते हैं, ‘ये जीत भले आज मिली है, लेकिन इसकी तैयारी 6 साल पहले शुरू हो गई थी। 24 अक्टूबर 2019 को महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे। BJP 105 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिलीं।’ ‘BJP देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाने वाली थी, तभी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अड़ गए। उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के लिए गठबंधन तोड़ दिया। पहली बार कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और 28 नवंबर को मुख्यमंत्री बन गए। तभी तय हो गया था कि शिवसेना को तोड़ना है। महाराष्ट्र में BJP को अपने दम पर खड़ी पार्टी बनाना है। आज जो नतीजे आए हैं, वो इसी प्लान का हिस्सा था।’ इस पर हमने BJP में हमारे सोर्स से बात की। वे बताते हैं कि हमारा पहला टारगेट था- एकनाथ शिंदे के जरिए शिवसेना को तोड़कर कमजोर करना। इसके बाद शिंदे को भी मजबूत न होने देना। दूसरा टारगेट था- अजित पवार के जरिए शरद पवार की NCP को तोड़ना, फिर टूटी हुई पार्टी को आमने-सामने की लड़ाई में हरा देना। 6 साल तक प्लान पर काम चलता रहा और BJP ने पहले विधानसभा और अब नगर निगम चुनाव में अपनी आखिरी चाल चल दी। महाराष्ट्र की दो बड़ी पार्टियां शिवसेना और NCP एक दायरे में सिमट गईं। महाराष्ट्र के 29 नगर निगम में से 23 BJP ने जीत लिए। ये पहली बार है जब महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय के चुनाव में पार्टी को इतनी बड़ी जीत मिली है। बाल ठाकरे की शिवसेना के गढ़ मुंबई-ठाणे, शरद पवार वाली NCP के गढ़ पश्चिम महाराष्ट्र के पुणे, सोलापुर, कोल्हापुर और कांग्रेस के दबदबे वाला विदर्भ, BJP ने तीनों पार्टियों को चुनाव में चित कर दिया। अब पार्टी इस स्थिति में है कि उसे सहयोगियों की जरूरत न पड़े। दूसरा सवाल: नगर निगम चुनाव के रिजल्ट के मायने क्या हैं? इसका जवाब एक्सपर्ट्स ने दिया। इसे 8 पॉइंट्स में समझते हैं… 1. BJP महाराष्ट्र में अपने दम पर खड़ी पार्टी बनी
अप्रैल-मई 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में BJP को बड़ा झटका लगा। पार्टी सबसे ज्यादा 26.4% वोट लेकर भी सिर्फ 9 सीटें जीत पाई। कांग्रेस 13 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। विधानसभा चुनाव में BJP ने वापसी की और 288 में से 132 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। इस बार देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने। अब ऐसी ही जीत नगर निगम चुनावों में मिली है। सीनियर जर्नलिस्ट संदीप सोनवलकर कहते हैं, ‘BJP ने अब एक तरह से पूरा महाराष्ट्र जीत लिया है। लोकसभा, विधानसभा और अब स्थानीय निकाय के चुनाव, तीनों जगह BJP के नेता सत्ता में हैं। हालांकि ये BJP के सहयोगियों के लिए खतरे की घंटी है। एकनाथ शिंदे की शिवसेना ठाणे तक सिमट गई है। अजित पवार की पार्टी NCP पूरे राज्य में एक भी जगह मेयर बना पाने की स्थिति में नहीं है।’ वहीं, BJP पॉलिटिकल एक्सपर्ट राजेंद्र साठे कहते हैं, ‘नगर निगम के चुनाव शहरी इलाकों में होते हैं। BJP को पहले से शहरों की पार्टी माना जाता है। शहरों में उसका सपोर्ट बेस रहा है। चुनाव से एक दिन पहले महिलाओं के खाते में लाडकी बहना स्कीम के 1500 रुपए भेजे गए। ये भी चुनाव में बड़ा फैक्टर रहा है।’ 2. एकनाथ शिंदे की शिवसेना सिर्फ ठाणे में सिमटी
डिप्टी CM एकनाथ शिंदे शिवसेना में टूट से पहले ठाणे के बड़े लीडर माने जाते थे। शिवसेना तोड़कर शिंदे BJP के साथ आ गए और मुख्यमंत्री बने। उद्धव ठाकरे से पार्टी छीन ली। नगर निगम चुनाव ने साबित कर दिया है कि वे अब भी सिर्फ ठाणे के नेता हैं। सीनियर जर्नलिस्ट संदीप सोनवलकर कहते हैं, ‘एकनाथ शिंदे ठाणे तो जीते, लेकिन आसपास के वसई-विरार, मीरा-भायंदर, नवी मुंबई, कल्याण डोंबिवली में हार गए। उन्हें ध्यान रखना होगा कि उन्होंने जितनी तोड़फोड़ की, अब सब खत्म हो चुकी है। सबकी अपनी जगह तय हो गई है।’ 3. उद्धव ठाकरे मुंबई हारे, लेकिन शिंदे को हराया
उद्धव ठाकरे के सामने अपना गढ़ मुंबई बचाने की चुनौती थी, लेकिन वे इसे बचा नहीं पाए। मुंबई में BJP-शिवसेना (शिंदे गुट) का गठबंधन जीत गया। 25 साल में पहली बार मुंबई में शिवसेना का मेयर नहीं होगा। उद्धव BJP से हार गए, लेकिन शिंदे को पटखनी दे दी। शिंदे साउथ मुंबई के कोर शिवसेना वोटर में सेंध नहीं लगा पाए। उद्धव ठाकरे हिंदुत्व के बजाय चुनाव में मराठी और मुंबई का मुद्दा लेकर आए। MNS नेता और भाई राज ठाकरे से गठबंधन कर मराठी और गैर मराठी के मुद्दे को हवा दी। उन्हें वोट तो मिले, लेकिन इतने नहीं कि मेयर चुन सकें। रात 11 बजे तक उद्धव की पार्टी 66 सीटों पर जीत चुकी थी, या आगे चल रही थी। संदीप सोनवलकर कहते हैं, ‘शिवसेना (उद्धव गुट) की मुंबई के अलावा भी हर जगह हार हुई है। साफ हो गया है कि वह सिर्फ मुंबई की पार्टी रह गई है। उद्धव ठाकरे 25 साल से चली आ रही मुंबई में सत्ता गंवा बैठे। हालांकि मुंबई में 60 से ज्यादा सीटें जीतकर उन्होंने अपनी पार्टी को खत्म होने से बचा लिया। एकनाथ शिंदे को मुंबई में करीब 26 सीटें मिली हैं। मुंबई में उद्धव ठाकरे की शिवसेना दूसरे नंबर की पार्टी रहेगी, शिंदे तीसरे नंबर पर आ गए हैं।‘ 4. पवार अपना गढ़ तक नहीं बचा पाए
BJP सोर्स बताते हैं कि शिवसेना टूटने के बाद अजित पवार के जरिए NCP को तोड़ा गया। ये भी ध्यान रखा गया कि अजित पवार को कंट्रोल में रखा जाए। अजित पवार कोऑपरेटिव के बड़े नेता रहे हैं। उनकी राजनीति स्थानीय निकाय के चुनाव और सहकारी समितियों से जुड़ी रही है। निकाय चुनावों में उनकी पार्टी का हारना बड़ी मात है। संदीप सोनवलकर कहते हैं कि चुनाव के सबसे बड़े लूजर अजित पवार ही हैं। इसकी तीन सबसे बड़ी वजहें हैं- 1. उनका कोई भी मेयर नहीं बन रहा।
2. अजित पवार ने ऐसे बयान दिए कि BJP के नेता नाराज हो गए।
3. उन्होंने चाचा शरद पवार से हाथ मिला लिया और BJP को ये पसंद नहीं आया। वहीं, राजेंद्र साठे कहते हैं, ‘शरद पवार को पसंद करने वाले बहुत लोग हैं, लेकिन उनके सारे अच्छे साथी अजित पवार के साथ चले गए हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में शरद पवार को झटका लगा था। उसके बाद से वे राजनीति में एक्टिव नहीं रहे। उन्होंने इस चुनाव में भी ज्यादा मेहनत नहीं की। वे अपनी राजनीति कर चुके हैं। उनकी तबीयत साथ नहीं देती।' 5. ओवैसी ने दिखाया- वे मुसलमानों के नेता
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने निकाय चुनावों में 95 सीटें जीती हैं। AIMIM को संभाजीनगर और मालेगांव में बड़ी कामयाबी मिली। ये सीटें अब तक कांग्रेस को मिलती थीं। इससे साबित हो गया कि मुस्लिम वोट AIMIM की तरफ शिफ्ट हो रहा है। मुस्लिम आबादी वाले संभाजीनगर में पार्टी को 24 सीटें मिली हैं। मुस्लिम वोटर्स के ओवैसी के पाले में जाने का नुकसान कांग्रेस को हुआ है। इसके अलावा नासिक जिले के मालेगांव नगर निगम में AIMIM 21 सीटें जीतकर दूसरे नंबर पर रही। यहां इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ महाराष्ट्र (ISLAM) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। उसने 84 में से 35 सीटें जीती हैं। शिवसेना (शिंदे गुट) को 18 सीटें मिलीं। समाजवादी पार्टी को 5 और कांग्रेस को 3 सीटें मिलीं। BJP सिर्फ दो सीटें जीत पाई है। 6. लातूर-चंद्रपुर के अलावा कांग्रेस पूरे महाराष्ट्र में लगभग खत्म
महाराष्ट्र में कांग्रेस विदर्भ रीजन में BJP को चुनौती देती रही है, लेकिन यहां चंद्रपुर को छोड़कर बाकी सभी जगह कांग्रेस बुरी तरह हारी। कांग्रेस को भिवंडी-निजामपुर, कोल्हापुर, अमरावती और लातूर में बढ़त मिली। लातूर में कांग्रेस को 70 में से 43 सीटें मिली हैं। विदर्भ के अलावा बाकी रीजन में कांग्रेस ने बहुजन वंचित अघाड़ी, NCP और शिवसेना के साथ गठबंधन किया था। लातूर पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का गढ़ हुआ करता था। मुंबई में कांग्रेस को 24 सीटें मिली हैं। पॉलिटिकल एक्सपर्ट राजेंद्र साठे कहते हैं- मुंबई में कांग्रेस और शिवसेना साथ लड़ते तो BJP को कड़ी टक्कर दे सकते थे। आज भी दलित वोट कांग्रेस को मिलता है। इससे शिवसेना और कांग्रेस दोनों को फायदा हो सकता था। 7. राज-उद्धव ठाकरे साथ आए, लेकिन गठबंधन बेअसर
20 साल बाद राज और उद्धव ठाकरे के साथ आने से सुर्खियां तो खूब बनीं, मराठी मानुष का मुद्दा भी बड़ा हुआ, लेकिन वोट नहीं मिले। शिवाजी पार्क मैदान में राज ठाकरे की सभा में भीड़ उमड़ी, लेकिन नासिक में वे अपनी सत्ता गंवा बैठे। मुंबई में भी कुछ खास नहीं कर पाए। राजेंद्र साठे इस पर कहते हैं, ‘राज ठाकरे अच्छे भाषणों से भीड़ जुटा लेते हैं, लेकिन वोट नहीं ला पाते। हालांकि राज ठाकरे की पार्टी अगर उद्धव की शिवसेना के साथ नहीं लड़ती, तो इतनी सीटें भी नहीं आतीं। ठाकरे बंधु मुंबई, ठाणे, पुणे और नासिक के अलावा कहीं चुनाव प्रचार के लिए भी नहीं गए।’ 8. देवेंद्र फडणवीस BJP की विनिंग मशीन
निकाय चुनाव में महाराष्ट्र के CM देवेंद्र फडणवीस ने खुद कमान संभाली थी। सीनियर जर्नलिस्ट संदीप सोनवलकर कहते हैं, ‘देवेंद्र फडणवीस ने साबित कर दिया है कि वे हर तरह का चुनाव जिता सकते हैं। अब BJP देवेंद्र फडणवीस को हटाने का रिस्क नहीं ले सकती। BJP को संगठन का भी फायदा मिला। पार्टी ने सिर्फ 14 जगहों पर गठबंधन किया और 15 जगह अकेले चुनाव लड़ा। नागपुर में गुटबाजी नहीं दिखी। यही वजह है कि पार्टी इतनी बड़ी जीत हासिल कर पाई।’