यूपी के BJP लीडर ने लिया चैलेंज, नक्सलगढ़ पहुंची सड़क:PWD-BRO पीछे हटे, 17 बार टेंडर खाली; बीजापुर-सुकमा में घुसकर पुलिस थाने बनवाए

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'बस्तर में नक्सली अब उखड़ चुके हैं। फोर्स एंटी नक्सल ऑपरेशन की सफलता की कहानी लिखने के बिल्कुल करीब है। हालांकि 15 साल पहले हमारे लिए सबसे बड़ा सवाल ये था कि जवान बस्तर के घने जंगलों के अंदर कैसे दाखिल हों? नक्सलियों के गढ़ में थाने कैसे बनें? वो सड़कें कैसे बनें जिनसे जवान कम समय में लंबी दूरी तय कर सकें?' 'फोर्टिफाइड थानों और सड़कों के लिए सरकार ने फंड तो जारी कर दिया था, लेकिन सवाल यह था कि इन्हें बनाएगा कौन? टेंडर पर टेंडर डाले गए, लेकिन छत्तीसगढ़ का एक भी कॉन्ट्रैक्टर न थाने बनाने के लिए आगे आया और न सड़क बनाने के लिए। PWD और यहां तक कि BRO ने भी हाथ खड़े कर दिए थे।' 2012 दिसंबर में पुलिस कॉर्पोरेशन हाउस के नए चेयरमैन का पद संभालने वाले डीएम अवस्थी बताते हैं कि थाने और सड़क बनाने का काम बहुत मुश्किल हो गया था। उसे न करने का विकल्प भी नहीं था। 17 बार टेंडर निकालने के बाद जब कोई एप्लिकेशन नहीं आई तो हमने ये टेंडर राज्य के बाहर वालों के लिए भी खोला। सबसे पहले ये चैलेंज यूपी के गोरखपुर के रहने वाले BJP लीडर राजीव मिश्रा ने लिया। वो जिला BJP अध्यक्ष थे और विधायक का चुनाव भी लड़ चुके थे। उन्होंने बस्तर के सबसे मुश्किल थाने बनवाने का पहला कॉन्ट्रैक्ट लिया। नक्सलियों के गढ़ बीजापुर और सुकमा में ये काम कितना चुनौती भरा रहा, दैनिक भास्कर की टीम ने इन्हें बनाने का जिम्मा लेने वाले कॉन्ट्रैक्टर्स से बात कर समझा। थाना बनाने के लिए 17 बार टेंडर निकाले, कोई आगे नहीं आया केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलियों के खात्मे के लिए 31 मार्च 2026 की डेडलाइन तय की है। एंटी नक्सल ऑपरेशन इसके करीब है। ये सब मुमकिन कैसे हुआ, ये समझने के लिए हमने छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी और पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन के चेयरमैन रहे डीएम अवस्थी से बात की। जो बस्तर में सड़क बनने की पूरी कहानी बताते हैं। वे कहते हैं, '2010 में ताड़मेटला की घटना हुई। इसमें नक्सलियों ने 78 जवानों को घेरकर मार गिराया था। रानीबोदली में गहरी नींद में सोते हुए जवानों को मारने की घटना हुई। उन दिनों नक्सलियों के हमलों में जवानों का मारा जाना रोजाना की बात हो गई थी।' 'हमारे एसपी रहे विनोद चौबे को मार दिया गया। ये वो घटनाएं हैं, जब पानी सिर के ऊपर निकल गया था। केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित राज्यों के लिए एक फंड जारी किया। इससे फोर्टिफाइड थाने और सड़कें बननी थीं। आदेश भी जारी हो गया।‘ '2010 में बजट पारित हो गया। इस काम में एक ही रोड़ा आ रहा था कि बस्तर में सड़क और थाने बनाने के लिए कॉन्ट्रैक्टर्स कहां से लाएं क्योंकि छत्तीसगढ़ का कोई भी ठेकेदार कॉन्ट्रैक्ट लेने के लिए तैयार नहीं था।' छत्तीसगढ़ के बाहर के लोगों के लिए टेंडर खोला गया, तब मिले कॉन्ट्रैक्टर डीएम अवस्थी आगे कहते हैं, '2012 दिसंबर में मुझे पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन का चेयरमैन बनाया गया। सड़क और थानों का काम कराने की जिम्मेदारी मिली। मैंने विभाग से कहा कि छत्तीसगढ़ का कोई कॉन्ट्रैक्टर आगे नहीं आएगा। हमें दूसरे राज्यों के कॉन्ट्रैक्टर्स के लिए टेंडर खोलने होंगे। अप्रूवल मिल गया। हमने यूपी, बिहार, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के अखबारों में टेंडर का प्रचार किया।' 'मैंने पर्सनल लेवल पर भी कुछ कॉन्ट्रैक्टर्स से संपर्क किया। उसमें एक श्रीवास्तव जी थे, वो रेलवे का ठेका लेते थे। अभी उनका पूरा नाम तो नहीं याद, लेकिन फिर उन्होंने ही मुझे गोरखपुर के एक कॉन्ट्रैक्टर राजीव मिश्रा जी का नाम दिया। राजीव BJP के जिला स्तर के नेता थे। उन्होंने विधायकी का चुनाव भी लड़ा था। मैंने उन्हें अप्रोच कर टेंडर के लिए तैयार किया।' हमने पूछा क्या वो आसानी से तैयार हो गए? जवाब में डीएम अवस्थी कहते हैं, आसानी से राजी तो नहीं हुए क्योंकि डर तो सबको ही था। ये 2013 की बात थी। राजीव काफी बातचीत के बाद माने। इन्हें पहले 5 थानों का ठेका दिया गया। थाने के बाद कुछ किलोमीटर की सड़क का भी ठेका दिया गया। ’ये हमारे लिए उम्मीद की पहली किरण थी। राजीव मिश्रा ने अपना काम टाइम पर पूरा किया। 2015 में हमें सड़क बनाने में फिर दिक्कतें आईं। तब हमें प्रमोद राठौड़ नाम के एक कॉन्ट्रैक्टर मिले। इत्तफाक से वो भी यूपी के थे। रायबरेली में उनका पैतृक घर था। हालांकि वो छत्तीसगढ़ में काफी समय से कंस्ट्रक्शन का काम कर रहे थे। हमने उनसे संपर्क किया। पहले वो भी हिचके, लेकिन फिर तैयार हो गए।' कुल कितने थाने बनाने थे? जवाब मिला, '75 थाने बनाए जाने थे। इसमें से 50-55 थाने बस्तर में बनने थे। कठिनाई इन्हीं थानों और यहां की सड़कें बनने को लेकर थीं।' कॉन्ट्रैक्टर बोले- सबसे बड़ा जोखिम बीजापुर का बेदरे थाना रहा बस्तर में थाने और सड़कें बनवाने वाले कॉन्ट्रैक्टर गोरखपुर के राजीव मिश्रा कहते हैं, 'डीएम अवस्थी से मेरी मुलाकात और बातचीत हुई। उन्होंने हमसे ये जोखिम भरा काम करने के लिए कहा। पहले 3 थाने बनाने को दिए, जो बस्तर में थे। हालांकि वे इतने जोखिम भरे नहीं थे। उसके बाद दो थाने का कंस्ट्रक्शन होना था।' 'बेदरे का नाम तो आज तक याद है। ये बीजापुर में बनना था और दूसरा सुकमा में। अवस्थी जी (पुलिस कार्पोरेशन के चेयरमैन) ने कहा- आपको स्क्वॉड देंगे। मैंने कहा कि मरवाना चाहते हैं क्या। मैं अपने तरीके से काम करवाऊंगा। जवानों के साथ जाऊंगा तो मौत पक्की है।' वे आगे कहते हैं, 'मैं छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों में पहले भी काम करवा चुका था। मैंने उनसे संपर्क किया और पूछा कि सुकमा और बीजापुर में क्या उनके कोई रिश्तेदार रहते हैं। कुछ लोग मिले और उनसे काम करवाया, ताकि उनके साथ घुल-मिल सकूं।' कभी कोई धमकी या खतरा महसूस हुआ? इस पर राजीव कहते हैं, ‘इसके लिए बड़ी रणनीति बनानी पड़ी। मैं कभी भी कंस्ट्रक्शन साइट पर नहीं रहता था। न ही कभी सीधा स्पॉट पर पहुंचता था। गाड़ियां बदल-बदलकर जाता था। फिर मुझे एक और काम सौंपा गया। वो और भी मुश्किल था। अब बेदरे में थाने के सामने 5 किलोमीटर सड़क बनाने का जिम्मा मिला। नक्सली सड़कों के सख्त खिलाफ थे। कुछ वक्त लगा, लेकिन वो काम भी पूरा किया।' आपको कभी नक्सलियों का डर नहीं लगा, अगर हमला कर देते तो? राजीव जवाब में कहते हैं, 'उस वक्त हमले तो आम बात थी, लेकिन गोरखपुर का आदमी डरता है क्या?' आप तब BJP में किस पद पर थे? जवाब मिला- 'मैं उस वक्त BJP जिला अध्यक्ष था। उससे पहले RSS का मंडल अध्यक्ष रहा। अब सेहत ठीक नहीं रहती तो सक्रिय राजनीति में नहीं हूं।' बस्तर में सड़कें बनाने वाले कॉन्ट्रैक्टर बोले... पिस्टल हमेशा पास रखता, अगर नक्सलियों ने पकड़ा तो खुद को मार लूंगा इसके बाद हमने रायबरेली के प्रमोद राठौड़ से बात की। उन्होंने बस्तर में सड़कों का जाल बिछाया। उन्होंने नक्सलियों के गढ़ में सड़क बनाने की जोखिम भरी दिलचस्प बातें बताईं। वे बताते हैं, 'बस्तर की एक सड़क है जिसे 'इंजरम भेजी' सड़क कहते हैं। ये सुकमा में है। बुर्कापाल अटैक हो, ताड़मेटला या फिर रानीबोदली अटैक। सब इसी के आस-पास हुए थे।' '2015-16 में यहां 20 किलोमीटर लंबी सड़क में से 13 किलोमीटर का कॉन्ट्रैक्ट हमें मिला। हमें ये सड़क बनाने में 2 साल लग गए। 2018 में जाकर काम पूरा हो सका।' हमने पूछा 13 किलोमीटर की सड़क बनाने में 2 साल का वक्त? राठौड़ कहते हैं, 'कितने दिन में सड़क बनेगी, सवाल ये नहीं था। सवाल ये था कि क्या इस सड़क को बनाने के लिए कोई ठेका लेगा?' 'इसके बाद इसी सड़क को आगे 6 किलोमीटर तक बढ़ाने के लिए एक और ठेका मिला। हमने वो भी पूरा किया। ये इलाका कुख्यात नक्सली रमन्ना का था। सिर्फ 20 किलोमीटर दूर ही उसकी ससुराल थी।' फिर ठेका लेते वक्त डर नहीं लगा? जवाब मिला, 'डर क्यों नहीं लगेगा, लेकिन फिर लगा कि कोई न कोई तो ये काम करेगा ही तो फिर मैं क्यों नहीं?' वे हंसते हुए कहते हैं, 'तब मैं हर वक्त अपने साथ एक पिस्टल रखता था कि अगर नक्सलियों ने हमला किया तो पहले सामना करूंगा। अगर लगेगा कि उनके हाथ आ जाऊंगा तो खुद को गोली मार लूंगा। मुझे नक्सलियों के हाथों मरना मंजूर नहीं था।' आप नक्सलियों के निशाने पर तो आए ही होंगे? 'हां, नक्सलियों ने जब दीवारों पर मेरे नाम के पोस्टर लगाए थे और धमकी दी थी। तब मैं कोई स्थायी ठिकाना नहीं बना सकता था। बनाता तो हमला तय था। मैंने कई ठिकाने बदले।' 'घर से एक गाड़ी पर बैठता था तो फिर रास्ते में दूसरी गाड़ी, फिर तीसरी गाड़ी बदलकर साइट तक पहुंचता था, ताकि अगर कोई खबरी लगा हो तो नक्सलियों तक सही खबर न पहुंचे। कोंटा की तरफ जाना होता तो पहले जगदलपुर जाते थे, फिर रिटर्न होकर कोंटा लौटते थे।' लालगढ़ को शहर से जोड़ने वाला खतरनाक हाईवे बनाया राठौड़ आगे बताते हैं, '2018-19 में 'दोरनापाल जगरगुंडा' में करीब 76 किलोमीटर लंबी रोड बनाने का ठेका लिया। ये दूसरी सबसे खतरनाक सड़क थी। आप उठाकर देख लीजिए कि जितने बड़े हमले हुए, सब इसके आस-पास ही हुए थे। 2015 से लेकर 2018 तक इंजरम भेजी रोड के आसपास 40 से ज्यादा हमले हुए। ये बात ऑफिशियल डेटा भी कहता है।' 'ये रोड बनाते हुए 2018 में मेरी 13 गाड़ियां (ट्रैक्टर, हाईवा और भी रोड बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले व्हीकल) नक्सली हमलों में जला दी गईं। 15-20 IED और प्रेशर कुकर बम तो रोजाना सड़क बनाते वक्त पुलिया और घुमाव पर मिलते थे। इसीलिए कंस्ट्रक्शन में भी देर हुई।' 'जो सड़क बनने वाली होती थी, वहां पहले सुरक्षाबलों के डॉक आकर 2-3 घंटे तक जगह की जांच करते। फिर वहां से मिले प्रेशर बम या IED डिफ्यूज करते या इन्हें दूर ले जाकर डिस्पोज करते। हमारे ट्रैक्टर के नीचे कई बार बम और IED आकर फट जाते थे। कई बार हमारे साथी घायल भी हुए। ये सड़क अब भी पूरी नहीं हुई। 10-12 किलोमीटर का काम बाकी है।' राठौड़ कहते हैं, 'जगदलपुर से कोंटा तक हाईवे था। 3 ठेकेदारों को बारी-बारी से ठेका दिया गया, लेकिन कोई पूरा नहीं कर पाया। फिर ये ठेका मुझे दिया गया। मैंने और मेरे दो साथी कॉन्ट्रैक्टर्स ने मिलकर इसे लगभग पूरा कर दिया है।' आपने ये सब कैसे मैनेज किया? 'हमने एक रणनीति बनाई थी। पहली बात साइट पर हम ज्यादा देर तक रुकते नहीं थे। जब भी वहां से निकलते तो रास्ता बदलकर निकलते। जिस गाड़ी पर वहां से बैठते, उस गाड़ी को कुछ ही देर में छोड़ देते, फिर दूसरी और फिर कुछ दूर बाद तीसरी गाड़ी बदलते। हर वक्त हमारे साथ जवान रहते थे।' .................. ये खबर भी पढ़ें... कौन हैं देवजी, गणपति और बेसरा, शाह के लिए चैलेंज 'हिड़मा एग्जीक्यूटर था, डिसीजन मेकर नहीं। वो नक्सलियों का एक बेहतरीन लड़ाका था। उसका एनकाउंटर एंटी-नक्सल ऑपरेशन की बड़ी कामयाबी है, लेकिन हम इस मूवमेंट के पीछे लग रहे दिमाग को खत्म करना चाहते हैं। अभी ऐसे 3 नाम हैं, जिनके सरेंडर या एनकाउंटर के बाद हम कह सकते हैं कि अब आंदोलन खत्म हुआ।' नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन खत्म होने के सवाल पर एंटी नक्सल ऑपरेशन की कोर टीम के एक अधिकारी ने ये जवाब दिया। पढ़िए पूरी खबर...
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