रात में तेज आवाज, 20 फीट पानी में डूबे गांव:वायनाड में 250 से ज्यादा मौतें, 400 घरों के गांव में सिर्फ 45 मकान बचे

1 year ago 8
ARTICLE AD
‘रात का वक्त था। सब सो रहे थे। अचानक तेज धमाका हुआ। मैं घबराकर उठा, कुछ समझ आता, तब तक घर में पानी घुसने लगा। बाहर देखा तो पूरे गांव में पानी भर गया था। पानी के शोर के साथ पड़ोसियों की चीख-पुकार सुनाई नहीं दे रही थी। मुझे समझ आ गया कि गांव में कुछ नहीं बचा है। मैं अंधेरे में ही बाहर भागा। तेज दौड़ लगाते हुए मेन रोड तक पहुंचा। मैं बच गया, लेकिन भाई का पता नहीं, वो कहां है।’ बिलाल जैसी ही हालत वायनाड के चार गांवों मुंडक्कई, चूरलमाला, अट्टामाला और नूलपुझा में हजारों लोगों की है। बिलाल मुंडक्कई में तबाही के बीच अपने भाई को तलाश रहे हैं। इस एरिया पहाड़ों और जंगलों से घिरा है। यहां लगातार भारी बारिश हो रही थी। 29-30 जुलाई की रात करीब 2 और 4 बजे लैंडस्लाइड हुई और नदी के पानी के साथ पहाड़ का मलबा इन चारों गांवों में घुस गया। इसके रास्ते में आए घर, पुल, सड़कें और गाड़ियां सब बह गए। अब तक कुल 270 मौतें हुई हैं। 200 से ज्यादा लोग लापता हैं। करीब 1600 लोगों को रेस्क्यू किया गया है। 8 हजार से ज्यादा लोग रिलीफ कैंप में हैं। प्रशासन ने अभी 249 मौतों की पुष्टि की है। हादसे के अगले दिन दैनिक भास्कर लैंड स्लाइड से सबसे ज्यादा प्रभावित मुंडक्कई पहुंचा। यहां तरह तबाही के निशान मौजूद हैं। टूटे घर, स्कूल, पुल बता रहे हैं कि नदी का बहाव कितना तेज रहा होगा। हम यहां पहुंचे तब भी तेज बारिश हो रही थी। इस वजह से रेस्क्यू ऑपरेशन बार-बार रोकना पड़ा। पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट। 3 हजार की आबादी वाला गांव मिट्‌टी में दबा बुधवार सुबह 7 बजे हम वायनाड के डिस्ट्रिक्ट हेड क्वॉर्टर कालपेटा से मेप्पाडी कस्बे के लिए निकले। ये कस्बा चूरलमाला की पहाड़ियों में बसा है। करीब 35 किमी के इस सफर में जगह-जगह टी-स्टेट और कॉफी के बागान दिखे। 20 किमी बाद जगह-जगह सड़क पर गिरे पेड़ नजर आने लगे। आसपास के लोग पुलिस की निगरानी में इन्हें हटाकर ट्रैफिक क्लियर करने में जुटे थे। हम जैसे-जैसे आगे बढ़े, मलबा और भीड़ भी बढ़ती गई। पुलिस वाले चेकिंग कर रहे थे। उन्होंने प्राइवेट गाड़ियों को आगे जाने से रोक दिया। आगे सड़कों पर सिर्फ एंबुलेंस, फायर ट्रक और रेस्क्यू कर रहे NDRF-SDRF जवान ही दिख रहे थे। इन सभी को मेप्पाडी कस्बे के मुंडक्कई गांव जाना था। करीब 3 हजार की आबादी वाले इस गांव में मंगलवार रात 2 बजे तीन लैंडस्लाइड हुई थीं। यहां से निकला बाढ़ का पानी तेज बहाव के साथ आगे के गांवों को बर्बाद करता गया। इसे केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने देश की सबसे बड़ी त्रासदी बताया है। रेस्क्यू टीम के साथ हम भी मुंडक्कई गांव की ओर चल दिए। पूरे रास्ते में लाल मिट्‌टी के पहाड़ मिले। बारिश की वजह से मिट्‌टी बहकर रास्तों पर आ गई है। लाल चिकनी मिट्टी चाय और कॉफी के लिए अच्छी मानी जाती है। पानी के बहाव से पुल टूटे, बारिश की वजह से मदद रुकी चूरलमाला से 5 किलोमीटर पहले सभी गाड़ियों को रोक दिया गया। हम पैदल चलकर चूरलमाला पहुंचे तो देखा कि कस्बा कीचड़ में डूबा हुआ है। पानी अब उतर गया है, लेकिन घरों की छतों तक उसके निशान बाकी हैं। आगे बढ़ते हुए रास्ते में एक बरसाती नदी मिली। इस पर बना पुल टूट गया है। इसी पुल से मेप्पाडी तक जा सकते थे। सेना की इंजीनियरिंग कोर के जवान लोहे का अस्थायी ब्रिज बना रहे थे। ब्रिज कब तक बन जाएगा? इस सवाल पर एक जवान ने बताया- बारिश बहुत तेज है। हालात खराब हैं। लगातार भी काम करेंगे तो, तब भी कम से कम 24 घंटे लगेंगे। जवान की बात का मतलब है कि आगे मलबे में दबे लोगों को 24 घंटे तक मदद नहीं मिल पाएगी। NDRF और SDRF के जवान लोकल वालंटियर के साथ मिलकर नदी पार करने की कोशिश कर रहे थे। बहाव इतना तेज है कि उन्हें लौटना पड़ा। इसके बाद आर्मी के जवानों ने बिजली के पोल, प्लाईवुड, लकड़ी के तख्ते और रस्सी से आने-जाने लायक छोटा ब्रिज बना दिया। इसी ब्रिज से रेस्क्यू टीम फावड़े, कुदाल, रस्सी, हथौड़े और कटर लेकर मेप्पाडी की ओर बढ़ी। गांव में पहुंचते ही सबसे पहले डेडबॉडी चूरलमाला भेजनी शुरू की। कुछ शव हेलिकॉप्टर से भेज दिए। बाकी जो बचे उन्हें नदी के पार ले जाना मुश्किल हो रहा था। NDRF और सेना के जवानों ने एक रोपवे बनाया और रस्सी के जरिए बॉडी नदी के दूसरी तरफ भेजीं। तभी बारिश तेज हो गई। हम करीब 1 घंटे नदी के किनारे पर फंसे रहे। बारिश रुकी तब ढाई किमी पैदल चलकर मुंडक्कई गांव पहुंचे। यहां का नजारा डरावना था। पूरा गांव कीचड़ में डूबा है। एक जेसीबी मलबा हटा रही थी। जितना मलबा हटता, रेस्क्यू टीम उतना ही आगे बढ़ पाती। गांव में एक दो मंजिला सरकार स्कूल दिखा। ये स्कूल नदी से करीब 20 मीटर की ऊंचाई पर था। इसके बावजूद पानी स्कूल में घुस गया। मलबे में 700 लोगों के फंसे होने की आशंका हम यहां पहुंचे ही थे कि बारिश फिर शुरू हो गई। बचने के लिए हम उसी स्कूल के कैंपस में शेड के नीचे खड़े हो गए। NDRF की टीम ने भी रेस्क्यू ऑपरेशन रोक दिया। करीब दो घंटे तक सब थम गया। ये दो घंटे काटने मुश्किल थे। हर तरफ पानी और कीचड़ है। सामने पहाड़ी नदी तेज धार से बह रही है। बारिश बंद हुई तो हम गांव में घुसे। यहां हमें बिलाल मिले। उनके घर को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन उनका भाई लापता है। बिलाल कहते हैं, ‘गांव में पानी घुसा तब भाई मुझसे पहले परिवार के साथ निकल गया था। अब भाई लापता है। मुझे उसकी फिक्र हो रही है।’ बिलाल से मिलने के बाद हम एक बस्ती में पहुंचे, जो नदी किनारे होने के बावजूद सेफ थी। घरों के बाहर कपड़े सूख रहे थे और बाइक खड़ी थीं। घरों में ताले नहीं थे। लगा कि यहां कोई रह रहा है। फिर समझ आया कि जान बचाकर भाग रहे लोगों के पास इतना वक्त ही नहीं था कि घर लॉक कर सकें। यहां हमें मोईदू मिले। वे घर में ताला लगाने के लिए लौटे थे। मोईदू बताते हैं, ‘सैकड़ों लोग अब भी मलबे में दबे हैं। वक्त के साथ उनके जिंदा होने की उम्मीद भी कम हो रही है।’ रेस्क्यू टीम के आने के बाद शवों के निकलने का सिलसिला तेज हो गया। रोड क्लियर होने के बाद रेस्क्यू टीम के 500 से ज्यादा जवान मलबा हटाने में जुट गए। मुंडक्कई गांव नदी के दोनों ओर बसा था। हम सिर्फ एक हिस्से में पहुंच सके थे। दूसरे हिस्से में पहुंचना मुश्किल था। उस तरफ पहाड़ पर कुछ लोग मदद का इंतजार करते दिखे। परिवार के 9 मेंबर लापता, किसी के बच्चे मिट्टी में दफन मुंडक्कई से निकल हम एक बार फिर मेप्पाडी कस्बे की ओर बढ़े। रेस्क्यू टीम यहां के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में डेड बॉडी रख रही है। यहां मिले राजेंद्रन बताते हैं, ‘मेरे परिवार के 9 मेंबर लापता हैं। पूरा घर मलबे में डूबा है। मैं ससुराल गया था, इसलिए बच गया। पत्नी और बच्चों को पता नहीं चल रहा हैं।’ हॉस्पिटल के बाहरी हिस्से में शेल्टर होम शुरू किया गया है। हादसे के बाद से मंदाकिनी यहीं रह रही हैं। बात करते हुए वे फूट-फूट कर रोने लगती हैं। बताती हैं, ‘मैं घर के बाहरी हिस्से में सो रही थीं। दोनों बेटे और बहुएं घर में थे। पानी भरने लगा तो मैं भागी। मेरे बच्चे वहीं दफन हो गए।’ इस शेल्टर होम में रहने वाले लोगों की देखरेख का जिम्मा मेपारदी पंचायत के लोगों को दिया गया है। यहां के सरपंच आदिल हसन बताते हैं, ‘रात 2 बजे पहली लैंड स्लाइड हुई। तेज आवाज सुनकर मेरे दोस्त का बेटा मोबाइल लेकर बाहर आया। अपनी ओर पानी आता देख दौड़कर सड़क पर पहुंच गया। इससे पहले कि वो परिवार के लोगों को बचा पाता, उसका पूरा घर मलबे में दब गया। उसने ही हमें फोन पर बताया।’ यहीं मिले अब्दुल्लाह हादसे वाली रात दोस्त के घर गए थे। लौटे तो घर और पूरा गांव बर्बाद हो चुका था। पिता की डेडबॉडी मिल गई है, मां और भाई अब भी गायब है। अब्दुल्लाह कहते हैं, ‘मैंने नदी के पानी में डेडबॉडी बहते देखी हैं। मुझे नहीं पता कि मेरी मां और भाई कहां है, लेकिन इस त्रासदी ने मेरा सब कुछ खत्म कर दिया।’ गांव की ही शकुंतला बताती हैं, ‘मेरी बहन, बेटा, उसकी बेटी, पत्नी सब मलबे में दब गए। मैं बेटी के घर गई थी, इसलिए बच गई। अगली सुबह टीवी में खबर देखकर पता चला। अब समझ नहीं आ रहा कि कहां जाऊं और किससे मिलूं। मैं 70 साल की हूं। आगे की जिंदगी कैसे कटेगी, समझ नहीं आ रहा। सभी की डेड बॉडी मिल चुकी है। मुझे इस उम्र में उनका अंतिम संस्कार करना है। वहीं SDRF के जवान विजयन बताते हैं, ’गांव में कंडीशन बहुत खराब है। हमें कमर तक कीचड़ में उतरकर रेस्क्यू करना पड़ रहा है। घरों में मलबा भरा है। उनमें कितने लोग है, पता नहीं चल पा रहा है। बड़ी मशीने भी मौके तक नहीं पहुंच पा रही हैं, इसलिए कहना मुश्किल है कि मलबे को हटाने में कितने और दिन लगेंगे।
Read Entire Article