‘मैंने कहा था कि 31 मार्च, 2026 को यह देश नक्सलवाद से मुक्त हो जाएगा। आज मैं दोहराना चाहूंगा कि जिस तरह से सुरक्षाबलों ने वीरता दिखाई है, हम इस लक्ष्य को हासिल करेंगे। देश नक्सलवाद से मुक्त होगा, वो क्षण आजादी के बाद सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में से एक होगा।’ गृह मंत्री अमित शाह ने 23 जून, 2025 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ये बात कही। वे बार-बार ये बात दोहरा रहे हैं। संसद में भी कह चुके हैं। साल 2013 में नक्सलियों का 20 राज्यों के 182 जिलों में असर था। अब ये घटकर सिर्फ 38 रह गए हैं। लगातार ऑपरेशन की वजह से नक्सल लीडरशिप खत्म हो रही है, फंडिंग रुकी हुई है। 58 साल पुराना और 40 हजार से ज्यादा जानें ले चुका नक्सलवाद क्या वाकई 31 मार्च 2026 तक खत्म हो जाएगा। दंतेवाड़ा के जंगलों से दिल्ली तक यही सवाल है। ‘नक्सलगढ़ से भास्कर’ सीरीज की आखिरी स्टोरी में हमने इसी सवाल का जवाब तलाशा है। इसके लिए हम छत्तीसगढ़ के नारायणपुर और बीजापुर के उस इलाके में गए, जहां दो महीने से नक्सलियों के एनकाउंटर चल रहे हैं। पिछले 50 साल से बस्तर की खबर कवर कर रहे सीनियर जर्नलिस्ट राजेंद्र बाजपेयी से मिले, जिन्होंने नक्सलवाद को पनपते, फैलते और फिर सिमटते देखा है। नक्सलवाद के बड़े पड़ाव
साल: 1954
नक्सलबाड़ी से 13 साल पहले सुकमा में दिखा ‘नक्सलवाद’
1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में किसान जमींदारों के खिलाफ खड़े हो गए। ये आंदोलन भले कुचल दिया गया हो, लेकिन नक्सलवाद की शुरुआत यहीं से हुई। वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित ये आंदोलन छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और केरल तक फैल गया। राजेंद्र बाजपेयी बताते हैं, ‘नक्सलबाड़ी से 13 साल पहले ही बस्तर में नक्सलवाद की पहली झलक दिख गई थी। तब 1954 में सुकमा में एक रैली हुई थी। जमींदारों के खिलाफ एक मुस्लिम लीडर के पीछे हजारों आदिवासी जुटे थे। तब के एक पुलिस अधिकारी ने शासन को भेजी रिपोर्ट में लिखा था कि यह आंदोलन भविष्य में बड़ा हो सकता है। यह रिपोर्ट केंद्र तक गई जरूर, लेकिन कभी बाहर नहीं आई।’ ‘इसके बाद 1980 के दशक में आंदोलन संगठित हुआ। दिलचस्प बात यह है कि इसे अफसरों ने खुद अनजाने में हवा दी। तब के कलेक्टर ने केंद्र से ज्यादा फोर्स और हथियार पाने के लिए मीडिया से नक्सलियों की मौजूदगी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में दबाव बढ़ा, तो नक्सलियों ने बस्तर के घने जंगलों को अपना ठिकाना बना लिया।’ ‘यहां उन्होंने आदिवासियों की दुखती रग को पकड़ा। आदिवासियों का सबसे ज्यादा शोषण फॉरेस्ट गार्ड और पटवारी करते थे। नक्सलियों ने 'जन अदालतें' लगाकर करप्ट सरकारी कर्मचारियों की सरेआम पिटाई की। इससे वे आदिवासी समाज के लिए मसीहा बन गए।’ ‘यह रिश्ता सिर्फ डर का नहीं, बल्कि भरोसे का भी था। नक्सली गांववालों की छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखते, बीमारों का इलाज करते। तब सरकारी सिस्टम से लोगों को कोई मदद नहीं मिलती थी। नक्सलियों ने आदिवासियों का भरोसा जीता और साउथ बस्तर में अपनी ‘सरकार’ चलाने लगे। दूसरा पड़ाव: सलवा जुडूम
नक्सलियों के खिलाफ आंदोलन, जिसने नक्सलवाद को हवा दी
राजेंद्र बाजपेयी बताते हैं, 'शुरुआत में बस्तर के जंगलों में एक धारणा बनी हुई थी। पुलिस गुरिल्ला युद्ध नहीं जानती और नक्सली सीधी लड़ाई से बचते हैं। गांवों में सड़कों के साथ सिक्योरिटी फोर्स की गाड़ियां पहुंचीं, तो ये नियम भी टूट गया।' 'जंगलों का सन्नाटा बारूदी धमाकों (IED) से टूटा। नक्सलियों ने घात लगाकर हमला करने को सबसे बड़ा और कारगर हथियार बना लिया। उनका आंख-कान गांव के लोग थे।' 'ताकत मिली तो मनमानी भी शुरू हो गई। नक्सलियों ने लोगों को गणेश पूजा करने से रोक दिया। रोजी-रोटी के सबसे बड़े जरिए तेंदूपत्ता के लिए बाहर जाने पर रोक लगा दी। रोटी पर संकट आया, तो दशकों से दबा गुस्सा फूट पड़ा।’ 'बीजापुर के कुटरू गांव से सलवा जुडूम की शुरुआत हुई। सलवा जुडूम यानी शांति का कारवां कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा के दिमाग की उपज थी। तब राज्य में BJP की सरकार थी, लेकिन कांग्रेस नेता के आंदोलन की शुरुआत में गवर्नर, मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, कलेक्टर, एसपी, सब पहुंचे। यह पहली बार था, जब नक्सलियों के खिलाफ आम लोगों ने हथियार उठा लिए। सरकार ने गांव के लड़कों को स्पेशल पुलिस ऑफिसर बनाकर बंदूकें थमा दीं। जल्द ही, ये बंदूकें पुरानी दुश्मनी निकालने का जरिया बन गईं। इसने लोगों में गुस्सा भर दिया। जो लड़ाई नक्सलियों के खिलाफ शुरू हुई थी, वो गांववालों को आपस में लड़ाने लगी। नक्सलियों ने इसका फायदा उठाया और आदिवासियों को वापस अपने पाले में कर लिया। नक्सलवाद का गढ़ बस्तर
राजेंद्र बाजपेयी बताते हैं, ‘आज बस्तर सबसे बड़े सैन्य जमावड़े का गवाह है। यहां करीब 1.5 लाख जवान तैनात हैं। हर 5 किलोमीटर पर एक कैंप है। नक्सलवाद अपने सबसे कमजोर दौर में हैं। नक्सलियों का 85% संगठन खत्म हो चुका है। 1500 करोड़ की सालाना फंडिंग लगभग बंद है। अब वे जवानों से हथियार नहीं लूट पा रहे हैं।’ ‘इस कामयाबी के पीछे डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड है। ये जवान यही पले-बढ़े हैं। वे जंगल के भूगोल और नक्सलियों की हर चाल से वाकिफ हैं। नक्सली रह चुके लोग भी DRG में हैं। इससे पुलिस का खुफिया तंत्र अभेद हो गया है। अब जानकारी नक्सलियों को नहीं, सिक्योरिटी फोर्स को मिल रही है।’ ‘नक्सली संगठन सिर्फ बाहरी हमलों से नहीं, अंदरूनी कलह से भी टूट रहा है। बड़े नेताओं के मारे जाने से कैडर का मनोबल गिरा है। ऐसी भी खबरें हैं कि आंध्रप्रदेश के नक्सल लीडर लोकल कैडर के साथ भेदभाव करते हैं। महिला कैडर का शोषण करते हैं। इससे संगठन की जन-योद्धा वाली छवि टूटी है। इसी वजह से नक्सली संगठन छोड़कर सरेंडर कर रहे हैं।’ ‘फिर भी 2026 तक नक्सलवाद खत्म होना मुश्किल’
राजेंद्र बाजपेयी मानने को तैयार नहीं हैं कि 2026 तक नक्सलवाद खत्म हो जाएगा। वे कहते हैं, ‘नक्सली बैकफुट पर जरूर है, लेकिन वे अब भी हमला करने की ताकत रखते हैं। 2026 की डेडलाइन राजनीतिक लक्ष्य हो सकती है, लेकिन यह लड़ाई अभी जारी रहेगी।’ बीजापुर के 60% गांव नक्सल प्रभावित
जगदलपुर से हम बस्तर के सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में पहुंचे। यहां जर्नलिस्ट गणेश मिश्रा से मिले। वे बताते हैं, ‘जिले के 639 गांवों में से 60% नक्सल प्रभावित हैं, खासकर गंगालूर और अबूझमाड़ का इलाका। हालांकि नए कैंप और सड़कों की वजह से नक्सलियों के सुरक्षित ठिकाने खत्म हो रहे हैं। वे अब एक जगह टिककर नहीं रह सकते।’ ‘नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की दोहरी रणनीति का असर साफ दिख रहा है। सैन्य अभियान, जिसमें आंध्र और तेलंगाना के बड़े नक्सली लीडरों को टारगेट किया जा रहा है। दो साल में 15 से ज्यादा टॉप कमांडर मारे गए हैं।' 'दूसरी तरफ, उन इलाकों में सुविधाएं दी जा रही हैं, जहां 40% आबादी के पास नागरिकता तक का सबूत नहीं था। सरकार राशन और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं दे रही है, तो नक्सलियों पर उनकी निर्भरता खत्म हो रही है।’ क्या 2026 तक नक्सलवाद खत्म हो सकता है? इस सवाल पर गणेश मिश्रा हां या ना में जवाब नहीं दे पाते। वे कहते हैं ऐसा होना मुमकिन भी है और नहीं भी। मुमकिन क्यों है: लोगों को भरोसा देकर कि सरकार उनके साथ है, नक्सलवाद को खत्म घोषित किया जा सकता है। सरकार ने इस बार जवानों और अधिकारियों को फ्री हैंड दिया है। ऐसा पहले नहीं था। मुश्किल क्यों है: आप ताकत का इस्तेमाल करके नक्सलियों को मार सकते हैं, लेकिन 40 साल पुरानी विचारधारा को खत्म नहीं कर सकते। भले ही आप जंगलों से नक्सलवाद खत्म कर दें, लेकिन शहरों में इसे जिंदा रखने वाले और बढ़ावा देने वाले लोगों को खत्म करना बहुत मुश्किल है। सिर्फ किसी को मारकर नक्सलवाद खत्म करना बहुत मुश्किल है। ‘31 मार्च के बाद लड़ाई नया मोड़ लेगी’
जर्नलिस्ट रानू तिवारी नक्सलियों से जुड़ी खबरें कवर करते रहे हैं। वे हाल में सुकमा जिले के एर्राबोरा से आए थे। इसी जगह कोंटा डिवीजन के एएसपी आकाश राव गिरिपुंजे IED ब्लास्ट की चपेट में आकर शहीद हो गए थे। रानू नक्सलवाद के खात्मे के दावों पर अलग नजरिया रखते हैं। वे कहते हैं, ‘सरकार के बयान धीरे-धीरे बदल रहे हैं। पहले कहा गया माओवाद खत्म करेंगे, अब कहा जा रहा है सशस्त्र माओवाद खत्म करेंगे। इसका मतलब है कि हथियारबंद कैडर या तो मार दिया जाएगा या गिरफ्तार कर लिया जाएगा, लेकिन विचारधारा बनी रहेगी।’ ‘सरकार की स्ट्रैटजी हर 10 किमी पर कैंप बनाकर यह घोषित करने की हो सकती है कि इलाका अब हमारे कंट्रोल में है। वह इसकी तुलना ओडीएफ मुक्त गांव से करते हैं। कागजों पर गांव खुले में शौच से मुक्त हो जाता है, लेकिन हकीकत कुछ और होती है। शायद 31 मार्च 2026 को माओवाद को भी इसी तरह खत्म घोषित कर दिया जाएगा।’ रानू कहते हैं, 31 मार्च के बाद यह लड़ाई नया और ज्यादा जटिल मोड़ लेगी। बंदूकों से कैडर खत्म हो सकता है, लेकिन विचारधारा नहीं। बड़े नक्सलियों जैसे बसवाराजू के मारे जाने से लीडरशिप कमजोर हुई है, लेकिन ये एक पार्टी है, उसका एक ढांचा है। रानू तिवारी कहते हैं, ‘सबसे बड़ा सवाल जमीन और संसाधनों का है। ऐसी बातें चल रही हैं कि अबूझमाड़ में सेना के लिए फायरिंग रेंज बनाने की योजना है। इसके लिए 54 गांव खाली कराए जा सकते हैं। इसी इलाके में तीन-चार बड़ी खदानें अलॉट हुई हैं।' 'अगर नक्सलवाद खत्म होने के बाद सरकार इन खदानों में काम शुरू करती है या फायरिंग रेंज बनाती है, तो आदिवासियों के साथ नई लड़ाई शुरू हो सकती है। विस्थापन का हमारा पिछला रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है।’ IG बोले- नक्सली कुछ जगहों में सिमटे, ज्यादातर इलाके मुक्त
बस्तर रेंज के आईजी पी सुंदरराज कहते हैं, सरकार और जनता दोनों की इच्छा है कि नक्सलवाद खत्म हो। सुरक्षाबलों ने इसे संकल्प की तरह लिया है। 2024 और 2025 में जैसी कामयाबी मिली, उससे पूरा भरोसा है कि नक्सल गतिविधियां जल्द खत्म होंगी।’ ‘नक्सल अभियान क्लाइमेक्स स्टेज में है। माओवादियों का एरिया सिमट गया है। कई इलाकों में उनकी गतिविधियां खत्म हो चुकी हैं। अब सिर्फ कुछ पॉकेट्स बचे हैं। ये पॉकेट्स इंटर डिस्ट्रिक्ट और इंटरस्टेट इलाकों में हैं।’ ‘जिलों को नक्सल-मुक्त घोषित करने में जल्दबाजी न हो’
पूर्व DGP आरके विज के मुताबिक, नक्सलवाद अपने सबसे कमजोर दौर में है। खुद माओवादी अपना जनाधार घटने की बात मान चुके हैं। उनकी टॉप लीडरशिप बिखर चुकी है। 2007 में 40 से ज्यादा सेंट्रल कमेटी मेंबर थे, आज सिर्फ 17-18 बचे हैं। हालांकि आरके विज चेतावनी देते हैं कि चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। उनके कई सीनियर लीडर अब भी एक्टिव हैं। इसलिए जिलों को नक्सल-मुक्त घोषित करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। 10 दिन में 6 मर्डर, इनमें एक सरेंडर कर चुका नक्सली
बस्तर में बीते 10 दिन में नक्सलियों ने 6 लोगों की हत्या की है। पामेड़ थाना क्षेत्र में दो लोगों की हत्या की गई, इनमें से एक सरेंडर कर चुका नक्सली था। इससे पहले इसी एरिया में नक्सलियों ने तीन गांववालों की हत्या कर दी थी। सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव की वजह से नक्सली छोटी-छोटी टुकड़ियों में बंट गए हैं। वे सुरक्षित ठिकाने ढूंढ रहे हैं। कभी नक्सलियों के बड़े नेता अपने साथ 200-250 कैडर लेकर चलते थे। उनकी 3 से 4 लेयर की सुरक्षा में 80 से 100 नक्सली तैनात रहते थे। अब ये संख्या 20 से 30 रह गई है। अबूझमाड़ में मारे गए एक करोड़ के इनामी बसवाराजू के साथ भी सिर्फ 35 नक्सली थे। इनमें से 26 को फोर्स ने मार गिराया। बस्तर अब नक्सलवाद से मुक्ति की राह पर
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बस्तर जिले को नक्सल प्रभावित जिलों की सूची से हटा दिया है। इसकी वजह अंदरूनी इलाकों तक सड़कें बनाना, नेटवर्क कनेक्टिविटी पहुंचाना और सुरक्षाबलों के कैंप बनाना है। झीरम घाटी और तुलसी डोंगरी एरिया में चार साल पहले जहां फोर्स का पहुंचना मुश्किल था, वहां अब सुरक्षाबलों के कैंप हैं। कभी पूरे बस्तर डिवीजन में फैला नक्सलवाद अब नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा तक सिमट गया है। 1970 के बाद सबसे खराब दौर में नक्सलवाद
केंद्र सरकार के मुताबिक, साल 2025 में अब तक 180 से ज्यादा नक्सली मारे गए हैं। छत्तीसगढ़ की बात करें, तो 2020 से 2023 के 4 साल में 141 नक्सली मारे गए थे। 2024 में 287 नक्सली मारे गए, 1000 अरेस्ट किए गए और 837 ने सरेंडर किया। सरकार के मुताबिक, देश में नक्सल प्रभावित जिले 126 से घटकर अप्रैल 2018 में 90 रह गए थे। जुलाई 2021 में ये 70 हुए और अप्रैल 2024 में सिर्फ 38 रह गए। छत्तीसगढ़ के बाद झारखंड सबसे ज्यादा प्रभावित
झारखंड: पश्चिम सिंहभूम और लातेहार, ये दो जिले नक्सल प्रभावित हैं। पश्चिम सिंहभूम में नक्सलियों की एक्टिविटी ज्यादा है। लातेहार और गढ़वा जिले में फैले बूढ़ा पहाड़ पर नक्सलियों का 30 साल कब्जा रहा। 2022 में सुरक्षाबलों ने इसे आजाद कराया। ये जगह राजधानी रांची से करीब 150 किलोमीटर दूर है। झारखंड में 2023 में नक्सलवाद से 129 मौतें हुईं थीं। 2024 में ये घटकर 69 रह गईं। यहां पोलित ब्यूरो के मेंबर मिसिर बेसरा और 25 लाख का इनामी मरकस एक्टिव हैं। सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम सिंहभूम के जंगलों में है, जो ओडिशा और छत्तीसगढ़ से लगते हैं। महाराष्ट्र: गढ़चिरौली राज्य का इकलौता नक्सल प्रभावित जिला है। राज्य की C-60 कमांडो फोर्स, जिसे आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड्स की तर्ज पर बनाया गया है, ऑपरेशन में काफी प्रभावी रही है। उत्तर गढ़चिरौली लगभग नक्सल मुक्त हो गया है। नक्सलियों का प्रभाव छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे एरिया तक ही बचा है। ओडिशा: राज्य के मलकानगिरी, कालाहांडी, कंधमाल और नुआपाड़ा नक्सल प्रभावित जिले हैं। राज्य में अब सिर्फ 100 से 120 कैडर एक्टिव होने का अनुमान है। आंध्र प्रदेश-ओडिशा सीमा स्पेशल जोनल कमेटी कभी यहां सबसे ताकतवर थी। जून 2025 में लीडर गजरला रवि की मौत के बाद कमेटी कमजोर हो गई है। अब सिक्योरिटी फोर्स की चिंता मलकानगिरी और कोरापुट जिले की वजह से है, जो आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ के ट्राई-जंक्शन पर हैं। आंध्रप्रदेश और तेलंगाना: आंध्रप्रदेश पुलिस ने 1989 में नक्सलियों से मुकाबले के लिए अलग यूनिट ‘ग्रे हाउंड्स’ बनाई थी। इसकी वजह से राज्य में नक्सलवाद लगभग खत्म हो गया है। आंध्र प्रदेश में अल्लूरी सीताराम राजू और विशाखापट्टनम के मांपा एरिया में नक्सलवाद की जड़ें बची हैं। ग्रेहाउंड्स की कामयाबी देखकर महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे राज्यों में भी ऐसी टीमें बनाई गईं। तेलंगाना में सिर्फ एक जिले भद्राद्री-कोथागुडम में नक्सलियों का मूवमेंट बचा है। हालांकि छत्तीसगढ़ से सटे एरिया में अब भी खतरा है। मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला ऐसा इलाका है, जिस पर फोर्स नजर रखती है। नक्सली इसे कॉरिडोर की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह रास्ता मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ को जोड़ता है। नक्सली इस रास्ते का इस्तेमाल एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने, सामान पहुंचाने और पुलिस से बचने के लिए करते हैं। .....................................
कैमरामैन: अजित रेडेकर
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